इस समय बिहार की राजनीति अपनी चरम सीमा पर है। एससी/एसटी एक्ट, प्रोमोशन में आरक्षण, सवर्णों पर लाठीचार्ज, नीतीश कुमार पर चप्पल फेंकना, ये सभी कारण हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को समझ आ गया है कि जो एनडीए का परंपरागत वोटर था वह अब हाथ से निकलता जा रहा है।
बिहार में बीजेपी और जेडीयू के नेता जहाँ भी जा रहे हैं वहीं पर भीड़ उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रही है और नेताओ पर बीते दिनों से हमले भी होने लगे हैं। भागलपुर में अश्विनी चौबे, गोबालगंज में स्मृति ईरानी, सासाराम में मनोज तिवारी जैसे नेताओं को भी सवर्णों की नाराजगी का सामना करना पड़ा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी बीते दिनों चप्पल फेंकी जा चुकी है।
बिहार में करीब 15% वोटर सवर्ण समाज के हैं, जो किसी भी पार्टी को सरकार बनाने में बहुत मदद करते हैं। बिहार में ब्राह्मण और भूमिहार एक बहुत बड़ा वोट बैंक है जिसे पार्टियां लुभाने के लिए प्रयास कर रही हैं।
सवर्ण समाज सालों से एनडीए का परंपरागत वोटर रहा है, परन्तु अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। बीजेपी को यही चीज सता रही है कि यदि ये वोट हाथ से निकल गए तो लोकसभा ही नहीं बल्कि विधानसभा चुनावों में भी हार का मुँह देखना पड़ सकता है।

सूत्रों के अनुसार बीजेपी एक बड़े सवर्ण नेता को बिहार का डिप्टी सीएम बना सकती है, ताकि सवर्णों की नाराजगी पर रोक लगाई जा सके। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि दशहरा के बाद बिहार के मंत्री मंडल में विस्तार हो सकता है, जिसमे 2019 को देखते हुए फैसले लिए जायेंगे।