इंदौर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शुक्रवार को भोजशाला-कमाल मौला परिसर मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि यह स्थान मूल रूप से मां सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। कोर्ट ने साफ कहा कि इस परिसर की धार्मिक पहचान “भोजशाला और मां सरस्वती मंदिर” के रूप में है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने साल 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा जारी उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें परिसर में मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी। यह फैसला जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने सुनाया।
पुरातात्विक सबूतों और इतिहास के आधार पर आया फैसला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भोजशाला परिसर को लेकर मिले पुरातात्विक सबूत, ऐतिहासिक दस्तावेज और पुराने साहित्य यह साबित करते हैं कि यह स्थान राजा भोज के समय मां सरस्वती की पूजा और संस्कृत शिक्षा का बड़ा केंद्र था। कोर्ट ने 2024 में पेश ASI सर्वे रिपोर्ट का भी जिक्र किया, जिसमें बताया गया था कि मौजूदा ढांचे में पुराने मंदिरों के हिस्सों का इस्तेमाल किया गया है। सर्वे के दौरान मंदिर शैली के खंभे, देवी-देवताओं की टूटी मूर्तियां, नक्काशी और अन्य धार्मिक अवशेष मिले थे। कोर्ट ने कहा कि इन सबूतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बेंच ने यह भी माना कि सदियों के उतार-चढ़ाव और विदेशी शासन के बावजूद यहां हिंदू पूजा पूरी तरह बंद नहीं हुई थी। कोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए सिद्धांतों का भी हवाला दिया और कहा कि किसी ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की पहचान तय करने में पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों को महत्व देना जरूरी है।
2003 का ASI आदेश रद्द, मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक जमीन का सुझाव
हाईकोर्ट ने ASI के 2003 वाले आदेश को गलत बताते हुए कहा कि उस समय परिसर की मूल धार्मिक पहचान को ठीक से नहीं समझा गया था। कोर्ट ने माना कि हिंदू श्रद्धालुओं के धार्मिक अधिकारों का ध्यान रखना जरूरी है और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत पूजा की स्वतंत्रता सुरक्षित है। हालांकि कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की भी कोशिश की। फैसले में कहा गया कि मुस्लिम समुदाय चाहे तो धार जिले में किसी दूसरी जगह मस्जिद या नमाज स्थल के लिए राज्य सरकार से जमीन मांग सकता है। कोर्ट ने इसे “दोनों पक्षों के बीच पूर्ण न्याय” की दिशा में जरूरी कदम बताया। इसके अलावा कोर्ट ने केंद्र सरकार और ASI को निर्देश दिए कि भोजशाला परिसर के भविष्य के प्रबंधन और प्रशासन को लेकर नई व्यवस्था तय की जाए। संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी ASI के पास रहेगी, लेकिन धार्मिक प्रबंधन को लेकर आगे निर्णय लिया जाएगा।
मां सरस्वती की मूर्ति वापस लाने पर भी कोर्ट की टिप्पणी
फैसले का एक अहम हिस्सा मां सरस्वती की उस प्राचीन मूर्ति से भी जुड़ा है, जिसे ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से ले जाकर लंदन के एक संग्रहालय में रखा गया था। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि मूर्ति को वापस भारत लाने और भोजशाला में दोबारा स्थापित करने की मांग पर विचार किया जाए। यह मामला हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं द्वारा दायर कई याचिकाओं के बाद कोर्ट पहुंचा था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भोजशाला हमेशा से हिंदू मंदिर रही है और यहां नमाज की अनुमति देकर हिंदू श्रद्धालुओं के अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। उन्होंने इसे भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी बताया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विजय कुमार शुक्ला ने खुद भोजशाला परिसर का दौरा भी किया था। माना जा रहा है कि परिसर की संरचना और स्थिति को करीब से देखने के बाद कोर्ट ने अपने निष्कर्ष और मजबूत तरीके से तैयार किए। फैसले के बाद इस निर्णय को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है। समर्थकों का कहना है कि हाईकोर्ट ने केवल धार्मिक भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर भोजशाला को मां सरस्वती का मंदिर माना है।
