नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए राज्यपालों और राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों पर फैसले की समय-सीमा तय करने वाले अपने ही पुराने आदेश को असंवैधानिक करार दिया। यह फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संविधान के आर्टिकल 143 के तहत भेजे गए रेफरेंस के जवाब में दिया गया। कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय संविधान राज्यपाल या राष्ट्रपति को निर्णय लेने के लिए किसी तय समय सीमा में नहीं बांधता और अदालत इस प्रक्रिया में कोई नई सीमा नहीं जोड़ सकती। यह निर्णय न सिर्फ केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों पर असर डालता है, बल्कि गवर्नर की भूमिका और विवेकाधिकार को लेकर चल रही बहस को भी नई दिशा देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने टाइमलाइन वाले अपने ही फैसले को पलटा
कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने माना कि तमिलनाडु के मामले में डबल बेंच का फैसला संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं था। पीठ ने कहा कि आर्टिकल 200 और 201 राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिलों पर निर्णय लेने का अधिकार देते हैं, लेकिन उन्हें किसी निर्धारित समय सीमा में बाध्य नहीं करते। अदालत का कहना था कि यह सीमा तय करना संविधान में मौजूद व्यवस्था से बाहर जाने जैसा है। फैसला सुनाते समय मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के विवेकाधिकार को अदालत सीमित नहीं कर सकती। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत द्वारा ऐसे निर्देश देना शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। यह भूमिका साफ करती है कि अदालतें संविधान के संरक्षक तो हैं, लेकिन वे उसे बदलने की स्थिति में नहीं।
‘डीम्ड असेंट’ का सिद्धांत संविधान के खिलाफ बताया
कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ यानी किसी बिल को स्वत: मंजूर मान लेने की धारणा को भी गलत ठहराया। तमिलनाडु में राज्यपाल द्वारा लंबे समय तक 10 विधेयकों को रोके रखने पर डबल बेंच ने उन्हें ‘स्वीकृत’ मान लिया था, लेकिन संविधान पीठ ने कहा कि यह प्रक्रिया राज्यपाल के मूल संवैधानिक अधिकारों में दखल देती है। पीठ ने कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे में जरूरी है कि राज्यपाल और विधानसभाओं के बीच संवाद बना रहे। राज्यपाल की भूमिका अवरोधक नहीं, बल्कि सहयोगी होनी चाहिए। अदालत ने राज्यपालों को यह भी याद दिलाया कि वे बिलों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि अदालतें उनके ऊपर समय की तलवार लटका दें।
अत्यधिक देरी पर अदालत दे सकती है सीमित हस्तक्षेप
फैसले का सबसे संतुलित पहलू यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण हस्तक्षेप की जगह ‘सीमित हस्तक्षेप’ का रास्ता चुना। अदालत ने कहा कि यदि राज्यपाल या राष्ट्रपति बिलों को बिना कारण बताए बहुत लंबे समय तक रोके रखते हैं, तो अदालत केवल इतना निर्देश दे सकती है कि वे एक वाजिब समय के भीतर फैसला लें। हालांकि, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि वह बिल की सामग्री या उसके गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी। उसका दखल केवल प्रक्रिया की देरी तक सीमित रहेगा। यह दृष्टिकोण अदालत के संवैधानिक मर्यादाओं को स्वीकार करने और संस्थागत संतुलन बनाए रखने की प्रतिबद्धता को दिखाता है।
