कौन हैं IPS अजय पाल शर्मा? बंगाल चुनाव में क्यों चर्चा में है यूपी का ‘सिंघम’

कोलकाता: उत्तर प्रदेश कैडर के 2011 बैच के आईपीएस अधिकारी अजय पाल शर्मा इन दिनों पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी के दौरान लगातार चर्चा में बने हुए हैं। वजह है उनकी सख्त कार्यशैली और एक वायरल वीडियो, जिसने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है।चुनाव आयोग ने उन्हें दक्षिण 24 परगना जिले की फाल्टा विधानसभा सीट पर पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया है। यहां उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है—निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान कराना।

आखिर क्यों सुर्खियों में हैं?

फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में मतदान के दौरान ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत सामने आई। आरोप था कि एक पार्टी के बटन पर टेप लगाया गया था, जिससे वोटिंग प्रभावित हो सकती थी। इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए चुनाव आयोग ने पूरे इलाके में दोबारा मतदान कराने का फैसला लिया, जिसकी प्रक्रिया 21 मई तक तय की गई। यहीं से मामला और ज्यादा संवेदनशील हो गया, और अजय पाल शर्मा की जिम्मेदारी भी बढ़ गई। इसी बीच उनका एक वीडियो वायरल हुआ। इस वीडियो में वे स्थानीय राजनीतिक नेता जहांगीर खान और उनके समर्थकों को साफ शब्दों में चेतावनी देते नजर आते हैं। उनका कहना था कि अगर किसी ने चुनाव प्रक्रिया में दखल देने की कोशिश की, तो सख्त कार्रवाई होगी। वीडियो सामने आते ही राजनीतिक माहौल गरमा गया। कुछ लोगों ने इसे मजबूत प्रशासन की निशानी बताया, तो कुछ ने उनके रवैये पर सवाल खड़े कर दिए। सोशल मीडिया पर यह चर्चा भी तेज हो गई कि क्या उन्हें लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में रखा जा सकता है—हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

कैसी है उनकी कार्यशैली?

अगर अजय पाल शर्मा के पिछले रिकॉर्ड को देखा जाए, तो उनकी छवि एक सख्त और तुरंत एक्शन लेने वाले अधिकारी की बनती है। अब तक वे 500 से ज्यादा पुलिस मुठभेड़ों का नेतृत्व कर चुके हैं, करीब 2000 अपराधियों को गिरफ्तार कर चुके हैं और 10 से ज्यादा अपराधी मुठभेड़ों में मारे गए हैं। खास बात यह है कि सिर्फ जौनपुर में ही 22 महीनों के भीतर 136 मुठभेड़ हुए। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि वे मामलों को लंबा खींचने के बजाय सीधे और तेजी से कार्रवाई करना पसंद करते हैं। शामली में उनकी तैनाती के दौरान एक अलग ही स्थिति देखने को मिली, जहां अपराधियों पर इतना दबाव बना कि कई लोगों ने खुद ही सरेंडर कर दिया। कुछ मामलों में तो अपराधियों ने तख्ती पहनकर खुद को पुलिस के हवाले किया, जिसे उनके द्वारा बनाए गए मानसिक दबाव का असर माना जाता है। वहीं, नोएडा में रहते हुए उन्होंने सिर्फ बाहरी अपराधियों पर ही नहीं, बल्कि पुलिस विभाग के अंदर भी कार्रवाई की। रिश्वत लेने के आरोप में कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ कदम उठाए गए, जिससे यह साफ हो गया कि उनकी सख्ती केवल अपराधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम के अंदर भी उतनी ही मजबूती से लागू होती है।

रामपुर पोस्टिंग — जहां सबसे बड़ा असर दिखा

साल 2019 में रामपुर में उनकी पोस्टिंग को उनके करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है। उस समय यह इलाका राजनीतिक दबाव और प्रभाव के लिए जाना जाता था। अजय पाल शर्मा के आने के बाद कार्रवाई तेज हो गई। प्रशासन ने एक बड़े राजनीतिक नेता का नाम एंटी भू-माफिया सूची में डाल दिया—यानी जमीन कब्जा करने वालों की लिस्ट में। इसके बाद 80 से ज्यादा केस दर्ज हुए, जिनमें जमीन कब्जा, धोखाधड़ी, फर्जी कागजात और धमकी जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े जमीन विवादों की जांच भी इसी दौरान तेज हुई। कई जगहों पर अवैध निर्माण पर बुलडोजर चला, नोटिस चिपकाए गए और साफ संदेश दिया गया कि अब नियम तोड़ने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इन कार्रवाइयों के बाद रामपुर में प्रशासनिक माहौल में बड़ा बदलाव देखने को मिला।

क्या बनाता है उन्हें अलग?

अजय पाल शर्मा का काम करने का तरीका थोड़ा अलग माना जाता है। वे सिर्फ ऑफिस में बैठकर आदेश देने वाले अधिकारी नहीं हैं—बल्कि खुद मौके पर पहुंचते हैं और हालात संभालते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत है—तेज और साफ फैसले लेना। वे फाइलों में मामला लटकाने के बजाय तुरंत एक्शन लेने के लिए जाने जाते हैं। दूसरी खास बात है—मानसिक दबाव बनाना। उनकी सख्ती का असर सिर्फ एक अपराधी पर नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क पर पड़ता है। इससे कई बार अपराध होने से पहले ही रुक जाते हैं। तीसरी बात—वे सिस्टम के अंदर भी सुधार करने की कोशिश करते हैं। यानी सिर्फ अपराधियों पर ही नहीं, बल्कि प्रशासन के अंदर की कमियों पर भी काम करते हैं। हालांकि, उनकी कार्यशैली विवादों से पूरी तरह दूर नहीं रही है। कुछ मुठभेड़ों पर सवाल उठे हैं और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं, जिससे उनकी छवि पर बहस भी होती रही है।

पश्चिम बंगाल में क्या हो सकता है असर?

पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान अक्सर हिंसा, राजनीतिक टकराव और कानून व्यवस्था की समस्याएं सामने आती हैं। ऐसे में एक ऐसे अधिकारी की जरूरत होती है, जो तुरंत फैसले ले सके और जमीन पर हालात संभाल सके। अजय पाल शर्मा का अनुभव बताता है कि वे ऐसे ही संवेदनशील और दबाव वाले इलाकों में काम कर चुके हैं। फाल्टा में उनकी सक्रियता से साफ है कि वे सिर्फ निगरानी नहीं कर रहे, बल्कि जरूरत पड़ने पर सीधे दखल भी दे रहे हैं। उनकी कार्यशैली का असर यह हो सकता है कि प्रशासन और ज्यादा एक्टिव हो, कानून व्यवस्था को लेकर सख्त संदेश जाए और संवेदनशील इलाकों में स्थिति पर मजबूत पकड़ बने।

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