मुंबई: महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 4 मई 2026 को वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र गाडलिंग को जमानत दे दी। गाडलिंग जून 2018 से लगातार जेल में बंद थे और करीब 8 साल तक बिना मुकदमे की सुनवाई शुरू हुए ही उन्होंने जेल में समय बिताया। वे इस मामले में गिरफ्तार 16 आरोपियों में आखिरी ऐसे व्यक्ति थे जो अब तक जेल में बंद थे, इसलिए यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है।
8 साल की कैद, बिना ट्रायल—अदालत ने उठाए सवाल
इस मामले की सुनवाई कर रही पीठ में न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता शामिल थे। अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि किसी भी व्यक्ति को इतने लंबे समय तक बिना मुकदमे की सुनवाई शुरू हुए जेल में रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि इस मामले के बाकी सभी आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर गाडलिंग को भी राहत मिलनी चाहिए। अदालत ने यह भी बताया कि मामले में अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और कई आवेदन अभी भी लंबित हैं। यानी मुकदमा शुरू होने में ही सालों लग गए। ऐसे में अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत आज़ादी सबसे महत्वपूर्ण है और बिना सुनवाई के लंबे समय तक किसी को बंद रखना उचित नहीं है। हालांकि इस जमानत का विरोध राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने किया। एजेंसी का कहना था कि गाडलिंग 2016 के सूरजगढ़ आगजनी मामले में भी आरोपी हैं, जिसमें 76 गाड़ियों को जलाने की साजिश रचने का आरोप है। इसके बावजूद अदालत ने भीमा कोरेगांव मामले में उन्हें जमानत दे दी।
जमानत के बाद भी नहीं मिलेगी आज़ादी, दूसरी केस बनी वजह
सुरेंद्र गाडलिंग को भले ही इस मामले में जमानत मिल गई हो, लेकिन उनकी रिहाई तुरंत नहीं हो पाएगी। वे अभी भी सूरजगढ़ आगजनी मामले में जेल में ही रहेंगे। इस मामले में उनकी जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और जब तक इस पर फैसला नहीं आता, तब तक उनकी रिहाई संभव नहीं है। यह मामला 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा से जुड़ा है। उस दिन 200 साल पूरे होने के मौके पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसके दौरान हिंसा भड़क गई थी। जांच एजेंसियों का दावा है कि इससे एक दिन पहले हुए एल्गार परिषद कार्यक्रम में दिए गए भाषणों ने इस हिंसा को हवा दी। बाद में इस पूरे मामले को एक बड़ी माओवादी साजिश से जोड़ते हुए कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रोफेसरों और वकीलों को गिरफ्तार किया गया। यह केस लंबे समय से विवादों में रहा है। खासकर इसलिए क्योंकि इसमें सख्त कानूनों का इस्तेमाल किया गया, आरोपियों को सालों तक बिना ट्रायल के जेल में रखा गया और सुनवाई में लगातार देरी होती रही। कई आरोपियों को स्वास्थ्य कारणों, लंबी कैद और समानता के आधार पर पहले ही जमानत मिल चुकी है। अब इस फैसले के बाद इस मामले के सभी 15 जीवित आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, लेकिन न्याय प्रक्रिया की धीमी रफ्तार पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।
