नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि नीट-पीजी 2025 का कट-ऑफ कम करने से डॉक्टरों की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा और मरीजों की सुरक्षा भी प्रभावित नहीं होगी। सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि नीट-पीजी परीक्षा डॉक्टरों की न्यूनतम योग्यता तय करने की परीक्षा नहीं है, बल्कि यह केवल पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटों के लिए मेरिट सूची बनाने का माध्यम है। सरकार के अनुसार एमबीबीएस डिग्री प्राप्त करने के बाद ही डॉक्टर की बुनियादी योग्यता तय हो जाती है।
एमबीबीएस डिग्री से तय होती है डॉक्टर की योग्यता
केंद्र सरकार ने हलफनामे में कहा कि नीट-पीजी परीक्षा देने वाले सभी उम्मीदवार पहले से ही एमबीबीएस पास और पंजीकृत डॉक्टर होते हैं। वे साढ़े चार साल की पढ़ाई और एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी कर चुके होते हैं। सरकार ने बताया कि एमबीबीएस डॉक्टर बिना पोस्टग्रेजुएशन के भी इलाज कर सकते हैं। वहीं पोस्टग्रेजुएशन के दौरान डॉक्टर वरिष्ठ विशेषज्ञों की निगरानी में काम करते हैं। अंतिम एमडी और एमएस परीक्षा में उम्मीदवारों को अलग-अलग लिखित और प्रायोगिक परीक्षा में कम से कम 50 प्रतिशत अंक लाना अनिवार्य होता है। इसलिए कट-ऑफ कम करने से डॉक्टरों की क्षमता या इलाज की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
खाली सीटें भरने के लिए घटाया गया कट-ऑफ
केंद्र सरकार ने बताया कि यह फैसला नेशनल मेडिकल कमीशन और स्वास्थ्य मंत्रालय ने मिलकर लिया ताकि बड़ी संख्या में मेडिकल की पोस्टग्रेजुएट सीटें खाली न रह जाएं। सरकार के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2025-26 में देशभर में करीब 70 हजार पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें उपलब्ध थीं और लगभग 2 लाख 24 हजार उम्मीदवारों ने परीक्षा दी थी। इसके बावजूद काउंसलिंग के दूसरे चरण के बाद हजारों सीटें खाली रह गई थीं। कट-ऑफ कम करने के बाद करीब 1 लाख अतिरिक्त उम्मीदवार पात्र हो गए और ज्यादातर सीटें भर गईं। सरकार ने कहा कि पहले भी जरूरत पड़ने पर कट-ऑफ कम किया गया है और यह एक नीतिगत फैसला है। फिलहाल इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जारी है और अदालत इस पर अंतिम फैसला सुनाएगी।
