मुंबई: महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक न्याय विभाग ने मंगलवार को एक सरकारी प्रस्ताव (जीआर) जारी कर वर्ष 2014 में मुस्लिम समुदाय को शिक्षा संस्थानों और सरकारी व अर्ध-सरकारी नौकरियों में दिए गए 5% आरक्षण को औपचारिक रूप से समाप्त कर दिया। यह व्यवस्था पहले ही अदालतों के फैसलों के कारण लागू नहीं थी, लेकिन अब सरकार ने इसे पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
2014 में अध्यादेश से लागू हुआ था आरक्षण, हाई कोर्ट ने रोक दी थी
यह आरक्षण जुलाई 2014 में अध्यादेश के जरिए लागू किया गया था, जिसमें मुस्लिम समुदाय को स्पेशल बैकवर्ड क्लास-A (एसबीसी-A) श्रेणी में रखा गया था। इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसके बाद नवंबर 2014 में अदालत ने इसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। इसके बाद राज्य विधानसभा तय समय सीमा यानी दिसंबर 2014 तक इस अध्यादेश को कानून में बदल नहीं पाई, जिसके कारण यह अपने आप समाप्त हो गया। मामला आगे बढ़ने पर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए भारत का सुप्रीम कोर्ट ने भी इस आरक्षण को रद्द कर दिया था। अदालत के आदेश के बाद यह व्यवस्था व्यवहार में लागू नहीं रही और कई वर्षों से इस कोटे के तहत न तो भर्ती हो रही थी और न ही शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश दिए जा रहे थे।
अब सरकार ने सभी पुराने आदेश और प्रमाणपत्र अमान्य घोषित किए
हालांकि अध्यादेश समाप्त होने और अदालतों के फैसलों के बावजूद राज्य सरकार ने उस समय जारी मूल सरकारी प्रस्ताव को औपचारिक रूप से रद्द नहीं किया था। अब नए जीआर के जरिए सरकार ने इससे जुड़े सभी फैसलों और पत्राचार को शून्य घोषित कर दिया है। इसका सीधा मतलब है कि अब 5% मुस्लिम आरक्षण के तहत कोई प्रवेश या सरकारी भर्ती नहीं होगी और इस श्रेणी में कोई जाति या वैधता प्रमाणपत्र भी जारी नहीं किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार यह कदम मुख्य रूप से प्रक्रियात्मक है, क्योंकि अदालतों के हस्तक्षेप और अध्यादेश की समयसीमा खत्म होने के बाद से यह आरक्षण वर्षों से लागू ही नहीं था।
