इलाहाबाद उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी, एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के दुरुपयोग पर झूठी प्राथमिकी दर्ज कराने वालों पर होगी आपराधिक कार्रवाई

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण और कड़े शब्दों में फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि यह कानून वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बनाया गया है, न कि किसी को परेशान करने, दबाव बनाने या निजी दुश्मनी निकालने का साधन। अदालत ने चेतावनी दी कि जो लोग जानबूझकर झूठी प्राथमिकी दर्ज कराते हैं या झूठा साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

झूठी प्राथमिकी और झूठी गवाही पर चलेगी आपराधिक कार्यवाही

सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इस कानून के तहत झूठी शिकायत दर्ज कराता है या न्यायालय में असत्य बयान देता है, तो उसके विरुद्ध संबंधित धाराओं में आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ की जाएगी। अदालत ने विशेष रूप से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 344 और भारतीय दंड संहिता की धारा 193 का उल्लेख किया।दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 344 के अंतर्गत न्यायालय को यह अधिकार है कि यदि किसी न्यायिक कार्यवाही के दौरान कोई व्यक्ति जानबूझकर झूठी गवाही देता है, तो उसके विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की जा सकती है। वहीं भारतीय दंड संहिता की धारा 193 के तहत झूठा साक्ष्य देने या गढ़ने पर कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर भारी आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। यह दंड राशि उस व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के रूप में दी जा सकती है जिसे झूठे मामले में फंसाया गया हो। अदालत ने माना कि झूठे आरोपों के कारण निर्दोष व्यक्ति को मानसिक पीड़ा, सामाजिक बदनामी और लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है।

झूठा मामला साबित होने पर सरकारी सहायता की वसूली

उच्च न्यायालय ने एक और महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा कि यदि जांच में यह सिद्ध हो जाता है कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी झूठी है, तो शिकायतकर्ता को उस आधार पर प्राप्त किसी भी सरकारी सहायता या लाभ की वसूली की जाएगी। अदालत ने कहा कि कई मामलों में शिकायत दर्ज होने के बाद आर्थिक सहायता या अन्य सुरक्षा संबंधी लाभ दिए जाते हैं। लेकिन यदि मामला असत्य पाया जाता है, तो ऐसे लाभ वापस लिए जाएंगे। न्यायालय का मत है कि सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

निजी रंजिश और जमीन विवाद में कानून के दुरुपयोग पर चिंता

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने चिंता व्यक्त की कि इस कानून के तहत कई मामले व्यक्तिगत दुश्मनी, जमीन संबंधी विवाद या धन के लेन-देन के कारण दर्ज किए जा रहे हैं, जबकि उनमें वास्तविक जातिगत अत्याचार का तत्व नहीं होता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून का उपयोग दबाव बनाने के लिए किया जाता है। न्यायालय ने सख्त शब्दों में कहा कि इस प्रकार का दुरुपयोग न केवल निर्दोष व्यक्तियों का जीवन प्रभावित करता है, बल्कि न्यायालय का बहुमूल्य समय भी नष्ट करता है। इससे उन वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है, जिन्हें सच में इस कानून की सुरक्षा की आवश्यकता है। अंत में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम एक संवेदनशील और आवश्यक कानून है। इसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को संरक्षण देना है। किंतु यदि कोई व्यक्ति इसका दुरुपयोग करता है, तो उसके विरुद्ध भी विधि के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।

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