लखनऊ: उत्तर प्रदेश में प्रेमी की शादी किसी और से होने पर बदला लेने के लिए एससी-एसटी एक्ट और दुष्कर्म का झूठा केस दर्ज कराने वाली युवती को अदालत ने साढ़े तीन साल की कैद और 30 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि उन सभी मामलों की मिसाल है जहाँ निजी रिश्तों के विवादों को कानून के दुरुपयोग में बदल दिया जाता है। जज ने साफ कहा कि झूठे मुकदमे असली पीड़ितों के न्याय को कमजोर कर देते हैं।
प्रेम संबंध, नाराज़गी और ‘बदले’ की शुरुआत
युवती पिछले पांच साल से दीपक नाम के युवक के साथ रिश्ते में थी। दोनों के बीच लंबे समय तक लिव-इन जैसा रिश्ता रहा। लेकिन फरवरी 2025 में दीपक ने किसी दूसरी महिला से शादी कर ली। यह बात रीना को बर्दाश्त नहीं हुई। गुस्से में वह सीधे दीपक के घर पहुंची, झगड़ा किया और शादी तुड़वाने का दबाव बनाया। जब बात नहीं बनी तो उसने बदला लेने के लिए दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज करा दी, ताकि दीपक को जेल भेजा जा सके। जांच में पता चला कि आरोप झूठे थे और पूरे मामले की जड़ सिर्फ बदला और नाराज़गी थी।
कोर्ट में सच आया सामने, जज ने कहा—“कानून का दुरुपयोग नहीं होने देंगे”
मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी की अदालत में हुई। अदालत ने सबूतों, गवाहों के बयानों और पूरे घटनाक्रम की गहराई से जांच की। जांच में यह स्पष्ट हो गया कि दीपक पर लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत थे और युवती ने बदला लेने की नीयत से झूठा मुकदमा दर्ज कराया था। सुनवाई के दौरान जज ने टिप्पणी की कि आज के समय में निजी रिश्तों में तनाव और विवाद बढ़े हैं, और कई लोग भावनाओं में आकर पुलिस या अदालत के सामने दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोप लगा देते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे झूठे मामलों से न सिर्फ कानून का खतरनाक दुरुपयोग होता है, बल्कि वास्तविक पीड़ितों के लिए न्याय की राह भी और मुश्किल बन जाती है। अदालत ने यह भी माना कि समाज में लिव-इन और प्रेम संबंध आम हो चुके हैं, लेकिन ऐसे संबंधों में टूटन आने पर किसी को झूठे केस में फँसाना एक गंभीर अपराध है। जज ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि झूठे मुकदमों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो लोग एससी-एसटी एक्ट जैसे संवेदनशील कानूनों पर भरोसा खो देंगे, जो समाज के कमजोर तबकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं।
सजा, जुर्माना और राहत राशि वापस लेने का आदेश
अदालत ने रीना को उसके अपराध के लिए साढ़े तीन साल की कैद और 30,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। फैसले में यह भी आदेश दिया गया कि यदि उसने केस दर्ज कराने के बाद राज्य सरकार से कोई राहत राशि ली है, तो उसे तुरंत वापस लिया जाए। कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर और जिला प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए कि ऐसे झूठे मामलों को बेहद गंभीरता से लिया जाए, ताकि कानून के दुरुपयोग पर रोक लग सके। विशेष न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि झूठा मुकदमा दर्ज कराने वालों को सख्त सजा नहीं मिलेगी, तो इस तरह की घटनाएँ और बढ़ सकती हैं। अदालत ने अपने निर्णय में यह भी साफ कर दिया कि दीपक के खिलाफ लगाए गए दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट के आरोप पूरी तरह गलत और निराधार थे, और युवती ने युव्क को जान-बूझकर फँसाने की कोशिश की थी।
