इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट की गैर-मौजूद धारा में समन जारी करने पर ट्रायल जज से मांगा जवाब

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट) से गंभीर लापरवाही के मामले में स्पष्टीकरण तलब किया है। मामला उस समन आदेश से जुड़ा है, जिसमें एक आरोपी को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की ऐसी धारा के तहत तलब किया गया, जो कानून में मौजूद ही नहीं है। हाईकोर्ट ने इसे न्यायिक शक्ति का लापरवाह इस्तेमाल बताते हुए कहा कि इस तरह के आदेश संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीधे प्रभावित करते हैं।

गैर-मौजूद धारा का हवाला, हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराज़गी

यह मामला रंजन बजाज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य से संबंधित है, जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी की पीठ कर रही है। कोर्ट ने पाया कि अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश ने 30 अप्रैल 2024 को समन जारी करते समय SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(5) का उल्लेख किया, जबकि अधिनियम में ऐसी कोई धारा है ही नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में धारा 3(2)(v) मौजूद है, लेकिन 3(2)(5) नाम की कोई व्यवस्था नहीं है। इस पर हाईकोर्ट ने न सिर्फ वर्तमान विशेष न्यायाधीश, बल्कि उस समय के विशेष न्यायाधीश से भी जवाब मांगा है कि आखिर इतनी लापरवाही से समन आदेश क्यों पारित किया गया।

जमीन विवाद से जुड़ा मामला, पुलिस ने दी थी क्लोजर रिपोर्ट

आवेदक ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उसे झूठे तरीके से SC/ST एक्ट के मामले में फंसाया गया है और पूरे विवाद की जड़ एक संपत्ति विवाद है। उसके अनुसार उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (UPSIDC) द्वारा उसे एक जमीन आवंटित की गई थी, जिसे औद्योगिक भूमि घोषित किया गया था। इसी जमीन को लेकर शिकायतकर्ता से विवाद हुआ और दबाव बनाने के उद्देश्य से आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया गया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आवेदक ने IPC की धारा 323 (मारपीट) और धारा 504 (जानबूझकर शांति भंग करना) के तहत अपराध किया है, साथ ही SC/ST एक्ट के तहत भी आरोप लगाए गए। न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीगढ़ के आदेश पर पुलिस ने FIR दर्ज की, लेकिन जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर यह कहा कि आरोपी के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता।

CrPC के प्रावधानों की अनदेखी का आरोप, आरोपी को अंतरिम राहत

पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के बावजूद शिकायतकर्ता ने प्रोटेस्ट पिटिशन दाखिल की, जिसके बाद विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट), अलीगढ़ ने मामले को शिकायत वाद मानते हुए CrPC की धारा 200 और 202 के तहत बयान दर्ज किए और आरोपी को समन जारी कर दिया। आरोपी ने हाईकोर्ट में यह भी तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने न केवल पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट को नजरअंदाज किया, बल्कि CrPC की धारा 202 का भी सही ढंग से पालन नहीं किया, जबकि आरोपी न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर रहता है। इन सभी दलीलों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल जज से जवाब मांगने के साथ-साथ शिकायतकर्ता से भी प्रतिक्रिया तलब की है। साथ ही, कोर्ट ने अगली सुनवाई तक आरोपी को किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई से अंतरिम राहत देते हुए यह आदेश दिया कि यदि उसके खिलाफ कोई वारंट जारी किया गया है, तो वह फिलहाल स्थगित रहेगा।

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