बेंगलुरु : कर्नाटक में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-4 मिशन के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंडिंग साइट की पहचान कर ली है। वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से मिली हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों के आधार पर मॉन्स माउटन (MM-4) क्षेत्र को लैंडिंग के लिए सबसे उपयुक्त माना है। यह मिशन चंद्रमा की सतह से मिट्टी और चट्टानों के सैंपल लेकर उन्हें सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाने पर केंद्रित होगा, जिसे इसरो का अब तक का सबसे कठिन मून मिशन माना जा रहा है।
चंद्रयान-2 की तस्वीरों से तय हुई लैंडिंग साइट
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसरो के वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी को लूनर एंड प्लैनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस (LPSC 2026) में पेश किया। लैंडिंग साइट तय करने के लिए चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर लगे ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरे (OHRC) से ली गई तस्वीरों का उपयोग किया गया। यह कैमरा चंद्र सतह को लगभग 32 सेंटीमीटर प्रति पिक्सल के रेजोल्यूशन में दिखाता है, जिससे छोटे-छोटे क्रेटर, पत्थर, ढलान और सतह की बनावट स्पष्ट दिखाई देती है। इससे वैज्ञानिकों को लैंडिंग के लिए सुरक्षित और खतरनाक इलाकों की पहचान करने में मदद मिली।
मॉन्स माउटन क्यों है सबसे उपयुक्त जगह
मॉन्स माउटन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित करीब 6,000 मीटर ऊंचा पहाड़ है। इसकी चोटी काफी हद तक सपाट है, जिससे यहां लैंडिंग आसान मानी जा रही है। पहले इसे लीबनिट्ज बीटा के नाम से जाना जाता था, बाद में नासा की गणितज्ञ और कंप्यूटर प्रोग्रामर मेल्बा रॉय माउटन के नाम पर इसका नाम मॉन्स माउटन रखा गया। वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में चार अलग-अलग संभावित लैंडिंग साइट्स का अध्ययन किया, जिनमें MM-4 साइट को सबसे सुरक्षित माना गया। यहां औसतन ढलान करीब 5 डिग्री है, जबकि लैंडर 10 डिग्री तक की ढलान पर उतरने में सक्षम है। इस इलाके में बड़े पत्थर कम हैं और ज्यादातर बोल्डर 0.3 मीटर से छोटे पाए गए हैं, जिससे लैंडिंग का खतरा कम हो जाता है। इस स्थान पर लगातार 11 से 12 दिन तक सूर्य की रोशनी मिलने की संभावना है और पृथ्वी से रेडियो कम्युनिकेशन भी स्पष्ट बना रहता है। इसके अलावा इस क्षेत्र में वॉटर आइस होने की संभावना भी जताई जा रही है, जो भविष्य के मिशनों के लिए अहम हो सकती है।
चंद्रयान-4 मिशन की खासियत और लक्ष्य
करीब 2104 करोड़ रुपए के इस मिशन का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा की सतह से मिट्टी और चट्टानों के नमूने लेकर उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। इसके लिए दो अलग-अलग रॉकेट का इस्तेमाल किया जाएगा। हैवी-लिफ्टर LVM-3 और इसरो का भरोसेमंद PSLV अलग-अलग पेलोड लेकर लॉन्च होंगे। मिशन के पहले स्टैक में लूनर सैंपल कलेक्शन के लिए एसेंडर मॉड्यूल और सतह पर उतरने के लिए डिसेंडर मॉड्यूल शामिल होंगे। दूसरे स्टैक में प्रोपल्शन मॉड्यूल, सैंपल ट्रांसफर मॉड्यूल और पृथ्वी पर वापसी के लिए री-एंट्री मॉड्यूल शामिल होंगे। यह पूरा सिस्टम चंद्रमा से सैंपल लेकर सुरक्षित तरीके से पृथ्वी तक पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।
चंद्रयान मिशनों की अब तक की उपलब्धि
भारत ने 14 जुलाई 2023 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से चंद्रयान-3 लॉन्च किया था, जो 23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरा। इस उपलब्धि ने भारत को चंद्रमा के साउथ पोल पर पहुंचने वाला पहला देश बना दिया। अब चंद्रयान-4 के जरिए भारत चंद्र सतह से सैंपल वापस लाने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा रहा है, जो अंतरिक्ष अनुसंधान में नई उपलब्धि साबित हो सकता है।
