कर्नाटक हाई कोर्ट ने सरकारी आदेश पर लगाई रोक: सार्वजनिक स्थलों पर सभा के लिए अनुमति जरूरी करने वाला आदेश असंवैधानिक बताया

धारवाड़: कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें कहा गया था कि अगर कोई व्यक्ति या संस्था सार्वजनिक स्थानों — जैसे सड़क, पार्क, मैदान या जलाशय — पर 10 या उससे अधिक लोगों की सभा करना चाहती है, तो उसे पहले सरकारी अनुमति लेनी होगी। अदालत ने कहा कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 13(2) का उल्लंघन करता है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों, खास तौर पर अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार) को सीमित करता है।

हाई कोर्ट ने कहा — आदेश ‘पहली नज़र में असंवैधानिक’

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने यह अंतरिम आदेश (interim order) धारवाड़ पीठ में दायर एक याचिका पर दिया।
यह याचिका हुबली और धारवाड़ की कई गैर-सरकारी संस्थाओं और व्यक्तियों — जैसे पुनश्चेतना सेवा संस्था, वी केयर फाउंडेशन, राजीव मल्हार पाटिल कुलकर्णी और उमा सत्यजीत चव्हाण — ने मिलकर दायर की थी। अदालत ने न सिर्फ़ इस आदेश पर रोक लगाई, बल्कि इससे जुड़े सभी परिपत्रों, अधिसूचनाओं और सरकारी निर्देशों को भी फिलहाल स्थगित कर दिया। अदालत ने कहा — “अगर यह सरकारी आदेश याचिका के निपटारे तक लागू रहता है, तो यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा, क्योंकि मौलिक अधिकारों को केवल किसी विधि द्वारा ही सीमित किया जा सकता है, किसी सरकारी आदेश से नहीं।”

सरकारी आदेश ने सभा को ‘गैरकानूनी’ बताया था

सरकार ने 18 अक्टूबर 2025 को यह आदेश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि अगर 10 या उससे ज़्यादा लोग किसी सार्वजनिक स्थान — सड़क, पार्क, मैदान या जलाशय आदि — पर बिना अनुमति के इकट्ठे होते हैं, तो उसे “ग़ैरक़ानूनी सभा (Unlawful Assembly)” माना जाएगा। हाई कोर्ट ने कहा कि जब लोगों के इकट्ठा होने और जुलूस निकालने से जुड़ी सारी व्यवस्थाएँ पहले से ही कर्नाटक पुलिस अधिनियम (Karnataka Police Act) में दी गई हैं, तो राज्य सरकार इस तरह का नया आदेश जारी करके लोगों के मौलिक अधिकारों को नहीं छीन सकती।

याचिकाकर्ताओं का तर्क — “लाफ्टर क्लब तक पर लगेगी रोक”

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक हरनाहल्ली ने दलील दी कि यह आदेश न सिर्फ़ कर्नाटक पुलिस अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, बल्कि यह नागरिकों की संवैधानिक स्वतंत्रता को भी खत्म करने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि अगर इस आदेश को लागू किया जाए, तो इसका मतलब होगा — “पार्क में किसी लाफ्टर क्लब की बैठक या कुछ लोग मिलकर टहलने तक को ‘ग़ैरक़ानूनी सभा’ माना जाएगा, अगर उनके पास अनुमति नहीं होगी।”

आरएसएस पर रोक लगाने की कोशिश के रूप में देखा गया आदेश

हालाँकि सरकारी आदेश में किसी विशेष संगठन का नाम नहीं लिया गया था, लेकिन इसे लेकर यह चर्चा तेज़ थी कि यह आदेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसी संस्थाओं की गतिविधियों पर रोक लगाने के उद्देश्य से जारी किया गया है। दरअसल, यह आदेश तब जारी हुआ जब कर्नाटक के आईटी-बीटी मंत्री प्रियांक खड़गे ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि आरएसएस जैसी संस्थाओं की सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थलों पर गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाए। सरकारी आदेश में यह भी कहा गया था कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन इस नियम का उल्लंघन करता है, तो पुलिस शिकायत मिलने पर या स्वयं भी मामला दर्ज कर सकती है — और ऐसा मामला भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के तहत दर्ज किया जाएगा।

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