नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम आदेश में साफ कहा कि मंदिर का धन देवता की संपत्ति है, इसे किसी भी निजी संस्था या को-ऑपरेटिव बैंक को लाभ पहुंचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट केरल के दो प्राचीन मंदिरों—थिरुनेल्ली श्री महाविष्णु मंदिर और श्री थ्रिसिलेरी शिव मंदिर—की फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़े विवाद पर सुनवाई कर रहा था। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि मंदिर के धन का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और इसे “असुरक्षित हाथों में जाने नहीं दिया जा सकता।”
मामला कैसे शुरू हुआ?
केरल हाई कोर्ट ने पहले आदेश दिया था कि मंदिरों की ओर से सहकारी बैंकों में जमा कराई गई फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) को बंद किया जाए और राशि वापस ली जाए। इस फैसले के खिलाफ माणंथवडी अर्बन सहकारी सोसाइटी लिमिटेड और थिरुनेल्ली सेवा सहकारी बैंक लिमिटेड सुप्रीम कोर्ट पहुँचे। उनका कहना था कि ये संस्थाएँ केरल सहकारी समितियाँ अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं और कई दशकों से स्थानीय लोगों, आदिवासी परिवारों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की वित्तीय जरूरतों की सेवा करती रही हैं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि मंदिर की एफडी कई वर्षों में धीरे-धीरे जमा की गई है और इनमें से ज्यादातर अभी परिपक्व (मंच्योर) नहीं हुई हैं। अचानक निकासी से उनकी संस्थाओं पर भारी असर पड़ेगा और कई सदस्य प्रभावित होंगे। उन्होंने यह भी बताया कि थिरुनेल्ली सेवा सहकारी बैंक वर्ष 1919 से मंदिर से जुड़ा हुआ है और 1986 में मंदिर परिसर के पास एक विस्तार काउंटर खोला गया था। बैंकों का कहना था कि हाई कोर्ट में दायर याचिका राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है और याचिका दायर करने वाले व्यक्ति का इस मामले से कोई सीधा संबंध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट कहा कि मंदिर का धन “सार्वजनिक विश्वास” से जुड़ा है और इसे किसी निजी संस्था को फायदा पहुंचाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बेंच ने टिप्पणी की कि परिस्थिति देखकर लगता है कि मंदिर के धन को ऐसे हाथों में रखा गया है जो सुरक्षित नहीं हैं, और यह बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। हालाँकि, कोर्ट ने बैंकों को तत्काल झटका दिए बिना राहत भी दी। आदेश में कहा गया कि मंदिरों की फिक्स्ड डिपॉजिट की राशि वापस लौटाने के लिए बैंकों को तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया जाएगा, ताकि संस्था और उसके सदस्यों को अचानक आर्थिक दबाव का सामना न करना पड़े। यह याचिका अडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड मनु कृष्णन के माध्यम से दाखिल की गई थी।
