कर्नाटक हाईकोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश पर सरकार का आदेश रोका: उद्योगों को मिली राहत

कर्नाटक : कर्नाटक हाईकोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला देते हुए राज्य सरकार के उस नोटिफिकेशन पर अस्थायी रोक लगा दी, जिसमें सभी रजिस्टर्ड औद्योगिक संस्थानों को महिला कर्मचारियों—स्थायी, कॉन्ट्रैक्ट और आउटसोर्स—को हर महीने एक दिन का पेड मासिक धर्म अवकाश देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल यह आदेश लागू नहीं होगा और सरकार अपनी तरफ से जवाब दाखिल करे। यह फैसला बेंगलुरु होटल्स एसोसिएशन और अविरता एएफ़एल कनेक्टिविटी सिस्टम्स लिमिटेड द्वारा दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया।

सरकार के आदेश पर सवाल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि जिन कानूनों के तहत उद्योग और अन्य संस्थान चलते हैं, उनमें पहले से ही छुट्टियों के विस्तृत नियम बने हुए हैं, लेकिन कहीं भी मासिक धर्म अवकाश का प्रावधान नहीं है। उनका कहना था कि सरकार ने केवल एक्जीक्यूटिव आदेश देकर ऐसा अवकाश अनिवार्य कर दिया है, जबकि इसके लिए किसी विधायी संशोधन या कानून की जरूरत थी। कोर्ट ने जब पूछा कि क्या सरकार ने इस आदेश से पहले उद्योगों से राय ली थी, तो याचिकाकर्ताओं ने बताया कि ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद हाईकोर्ट ने नोटिफिकेशन पर अंतरिम रोक लगा दी और सरकार को अपना पक्ष रखने का समय दिया।

उद्योग जगत की दलील

याचिका में यह भी कहा गया कि होटल एसोसिएशन के करीब 1540 सदस्य हैं और ये सभी ऐसे कानूनों के तहत रजिस्टर्ड हैं जो कर्मचारियों की सेहत, सुरक्षा, काम के घंटे, साप्ताहिक छुट्टियाँ और पेड लीव पहले से ही तय करते हैं। मॉडल स्टैंडिंग ऑर्डर्स के अनुसार कर्मचारियों को फैक्ट्री एक्ट के अनुसार छुट्टियाँ मिलती हैं और इसके अलावा 10 दिन की कैजुअल लीव भी होती है। उद्योग जगत का कहना है कि जब पूरा ढांचा पहले से मौजूद है, तो बिना कानूनी आधार के सरकार का ऐसे अवकाश को अनिवार्य कर देना न सिर्फ हस्तक्षेप है बल्कि प्रैक्टिकल तौर पर लागू करना भी मुश्किल होगा।

अतिरिक्त आर्थिक बोझ और प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का आरोप

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि महिलाओं को अतिरिक्त मासिक धर्म अवकाश देने से उद्योगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा, खासकर उन संस्थानों पर जहां महिला कर्मचारी अधिक हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस तरह का आदेश जारी करने से पहले न तो कोई प्रारंभिक नोटिफिकेशन जारी किया और न ही उद्योगों से आपत्तियाँ मांगीं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिका में नोटिफिकेशन को असंवैधानिक बताते हुए इसे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करार दिया गया है और नोटिफिकेशन को रद्द करने की मांग की गई है।

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