नई दिल्ली: NEET-PG 2025-26 सत्र के लिए क्वालिफाइंग मानकों में भारी कटौती के बाद सरकारी मेडिकल कॉलेजों की पोस्टग्रेजुएट सीटें बेहद कम अंकों पर भरने लगी हैं। तीसरे राउंड की काउंसलिंग में सिंगल डिजिट और बहुत कम स्कोर वाले उम्मीदवारों को भी क्लिनिकल और नॉन-क्लिनिकल शाखाओं में सीटें मिलने से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को लेकर डॉक्टरों और शिक्षकों ने गंभीर चिंता जताई है।
कम अंकों पर क्लिनिकल ब्रांच और प्रीमियर कॉलेजों में दाखिला
तीसरे राउंड की PG काउंसलिंग में यह स्थिति साफ दिखी कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कई सीटें बेहद कम अंकों पर भर गईं। कई प्रीमियर संस्थानों और मुख्य क्लिनिकल ब्रांच में भी ऐसे उम्मीदवारों को प्रवेश मिला जिनके अंक बहुत कम थे। रोहतक के एक सरकारी संस्थान में MS ऑर्थोपेडिक्स की सीट एक ऐसे उम्मीदवार को मिली जिसने 800 में से सिर्फ 4 अंक हासिल किए थे। दिल्ली के एक प्रमुख मेडिकल कॉलेज में ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी की सीट 44 अंकों पर और जनरल सर्जरी की सीट 47 अंकों पर अलॉट हुई। ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन में 10 अंक, एनाटॉमी में 11 अंक और बायोकेमिस्ट्री में माइनस 8 अंकों पर भी सीटें भरी गईं, जिनमें आरक्षित और PwD कैटेगरी के उम्मीदवार शामिल थे। इससे मेडिकल समुदाय में चिंता और बढ़ गई है।
कट-ऑफ घटाने के फैसले के बाद बदला पूरा परिदृश्य
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2025-26 सत्र के लिए NEET-PG क्वालिफाइंग मानकों में बड़ी कटौती की थी। अलग-अलग कैटेगरी के कट-ऑफ काफी कम कर दिए गए, जिससे बहुत कम और यहां तक कि नेगेटिव स्कोर वाले उम्मीदवार भी क्वालिफाई करने लगे। इस फैसले का असर सीधे काउंसलिंग में दिखाई दिया, जहां सीटें खाली न रहें इस उद्देश्य से कम अंकों पर भी अलॉटमेंट किया गया। हालांकि डॉक्टरों का कहना है कि यह कदम सुविधा के लिए लिया गया फैसला है, लेकिन इससे गुणवत्ता और योग्यता से समझौता हो सकता है।
डॉक्टरों और मेडिकल शिक्षकों ने जताई गंभीर चिंता
सरकारी मेडिकल कॉलेजों के वरिष्ठ डॉक्टरों और फैकल्टी का कहना है कि सर्जिकल और क्लिनिकल ब्रांच में इतने कम अंकों पर प्रवेश देना मेडिकल शिक्षा के स्तर में गिरावट का संकेत है। उनका मानना है कि 4, 11, 44 या 47 जैसे अंक बुनियादी योग्यता और तैयारी की कमी को दिखाते हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि एंट्री स्तर पर मानक कमजोर होंगे, तो आगे चलकर इसका असर सीधे मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ेगा। कई डॉक्टरों का कहना है कि ऑर्थोपेडिक्स जैसी कठिन सर्जिकल शाखा में लगभग शून्य अंकों पर सीट मिलना सिस्टम पर दबाव और गंभीर खामियों का संकेत है।
नीति पर सवाल, सरकार का बचाव और भविष्य की चिंता
यह फैसला सरकार के पहले के रुख से अलग माना जा रहा है। जुलाई 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि न्यूनतम क्वालिफाइंग पर्सेंटाइल मेडिकल शिक्षा के मानकों को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं और अदालत ने भी इस बात से सहमति जताई थी। मौजूदा व्यवस्था का बचाव करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि PG सीटें संशोधित नियमों के तहत ही दी जा रही हैं और डॉक्टरों की क्षमता केवल एंट्री कट-ऑफ से नहीं, बल्कि ट्रेनिंग और एग्जिट एग्जाम से तय होती है। उन्होंने कहा कि मेडिकल कॉलेजों और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे अयोग्य उम्मीदवारों को आगे न बढ़ने दें। मेडिकल शिक्षकों का कहना है कि यह समस्या केवल कट-ऑफ तक सीमित नहीं है। तेजी से सीटें बढ़ाई गई हैं, लेकिन प्रशिक्षित फैकल्टी और संसाधनों में उतनी वृद्धि नहीं हुई। क्लासरूम में भीड़, कमजोर बेडसाइड ट्रेनिंग और ऑनलाइन पढ़ाई पर बढ़ती निर्भरता ने ट्रेनिंग की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। कई पोस्टग्रेजुएट छात्र कमजोर थ्योरी और क्लिनिकल स्किल के साथ आ रहे हैं और उन्हें पास करने का दबाव भी रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल शिक्षा की कमियां तुरंत दिखाई नहीं देतीं, लेकिन आने वाले वर्षों में जब यही डॉक्टर स्वतंत्र रूप से मरीजों का इलाज करेंगे, तब इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। इससे मरीजों की सुरक्षा और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का भरोसा प्रभावित होने का खतरा है।
