जोधपुर : राजस्थान में आटा चक्की पर हुए एक मामूली विवाद से शुरू हुआ मामला 32 साल बाद राजस्थान हाई कोर्ट तक पहुँचा, जहाँ अदालत ने लालसिंह को SC/ST एक्ट के तहत दर्ज केस में बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह कानून कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए बना है, लेकिन इसका इस्तेमाल तथ्यों और सबूतों के आधार पर संतुलित तरीके से होना चाहिए।
मामूली आर्थिक विवाद से दर्ज हुआ SC/ST एक्ट का केस
यह मामला साल 1993 का है। जोधपुर जिले की बिलाड़ा तहसील के सोवणिया गाँव के रहने वाले लालसिंह गेहूँ पिसवाने के लिए आटा चक्की पर गए थे। पिसाई के पैसे को लेकर उनकी चक्की संचालक से कहासुनी हो गई। उस समय लालसिंह ने इसे सामान्य विवाद मानकर नजरअंदाज कर दिया, लेकिन बाद में चक्की संचालक ने थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि लालसिंह ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, रास्ता रोका और मारपीट की। इसी आधार पर उनके खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया। मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने लालसिंह को दोषी ठहराया और छह महीने की साधारण कारावास के साथ जुर्माने की सजा सुनाई। लालसिंह ने जेल की सजा पूरी की, लेकिन इसके बाद उनके जीवन में सामाजिक अपमान, मानसिक तनाव और पारिवारिक परेशानियों का लंबा दौर शुरू हो गया।
जेल से बाहर आने के बाद हाई कोर्ट में शुरू हुई कानूनी लड़ाई
जेल से रिहा होने के बाद लालसिंह ने खुद को निर्दोष साबित करने के लिए राजस्थान हाई कोर्ट में अपील की। वर्षों तक चली सुनवाई में उन्होंने कहा कि पूरा मामला पैसों के लेनदेन से जुड़े विवाद का परिणाम है और इसमें जातिगत अपमान का कोई ठोस आधार नहीं है। हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाते पाए गए। एक गवाह ने घटना 24 जुलाई को सार्वजनिक कुएँ के पास बताई, जबकि शिकायत में 25 जुलाई और अलग स्थान का जिक्र था। इससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए। इसके अलावा FIR भी कथित घटना के करीब 13 दिन बाद दर्ज कराई गई थी। अदालत ने माना कि देरी और बयान में विरोधाभास से यह शक मजबूत होता है कि मामला योजनाबद्ध तरीके से दर्ज कराया गया। जाँच अधिकारी की रिपोर्ट में भी दोनों पक्षों के बीच पैसों को लेकर विवाद की बात सामने आई।
हाई कोर्ट की टिप्पणी: कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए
सभी तथ्यों और सबूतों को देखते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने लालसिंह को निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट एक विशेष कानून है, जिसका उद्देश्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना है, लेकिन इसके तहत दोष सिद्ध करने के लिए यह साबित होना जरूरी है कि अपमान जानबूझकर, केवल जाति के आधार पर और सार्वजनिक रूप से किया गया हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर विवाद की जड़ निजी या आर्थिक है, तो केवल जातिसूचक शब्दों का आरोप लगना अपने आप में इस एक्ट के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इस फैसले के साथ कोर्ट ने यह संदेश भी दिया कि कानून का इस्तेमाल न्याय के लिए होना चाहिए, न कि किसी निजी विवाद को बढ़ाने या दबाव बनाने के लिए।
