‘सिर्फ मौके पर मौजूद होना अपराध नहीं’ : सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के व्यक्ति पर दर्ज SC/ST एक्ट का केस किया रद्द

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि किसी घटना स्थल पर केवल मौजूद होना और आरोपों का अस्पष्ट होना, किसी व्यक्ति को ट्रायल के लिए खड़ा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने भागलपुर की ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित संज्ञान और समन आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।

‘सिर्फ मौजूदगी के आधार पर ट्रायल कराना न्याय का मज़ाक’

सुप्रीम कोर्ट ने केशव महतो की अपील स्वीकार करते हुए राज्य सरकार की इस दलील को रिकॉर्ड पर लिया कि अपीलकर्ता के खिलाफ केवल यही आरोप है कि वह घटना के समय अन्य सह-आरोपियों के साथ मौजूद था। उसके द्वारा किसी भी तरह का कोई ठोस, विशिष्ट या सक्रिय कृत्य आरोप में नहीं बताया गया है। अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में आरोपी को अन्य सह-आरोपियों के साथ ट्रायल का सामना करने के लिए मजबूर करना “न्याय का मज़ाक” होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति की मौजूदगी से यह साबित नहीं होता कि उसने अपराध में भाग लिया है, खासकर जब उसके खिलाफ कोई ठोस आरोप न हो।

SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी और पूरा मामला

मामला वर्ष 2019 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि भागलपुर के एक आंगनवाड़ी केंद्र में उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट की गई और कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल हुआ। इसके बाद 9 अक्टूबर 2020 को ट्रायल कोर्ट ने IPC की विभिन्न धाराओं और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि SC/ST एक्ट की धाराएं केवल इस आधार पर लागू नहीं हो जातीं कि पीड़ित अनुसूचित जाति या जनजाति से है। अदालत ने कहा कि अपमान या धमकी व्यक्ति की जाति के कारण और जानबूझकर सार्वजनिक रूप से की गई होनी चाहिए। केवल गाली देना या केवल जाति का नाम लेना, अपने आप में अपराध नहीं बनता। एफआईआर और चार्जशीट की जांच के बाद कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता के खिलाफ जातिसूचक शब्द कहने या जाति के कारण अपमान करने का कोई स्पष्ट आरोप नहीं है। IPC के तहत लगाए गए आरोपों को भी अदालत ने सामान्य और कमजोर बताया। इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ SC/ST एक्ट या IPC की किसी भी धारा के तहत कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता और अंत में उसकी आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

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