नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 4 सितंबर 2025 को SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कहा कि इस कानून के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत केवल उसी स्थिति में दी जा सकती है, जब प्राथमिकी यानी FIR में दर्ज आरोप इतने कमजोर हों कि पहली नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाए कि कोई अपराध हुआ ही नहीं। अदालत ने यह भी कहा कि अग्रिम जमानत पर सुनवाई करते समय मिनी-ट्रायल नहीं किया जा सकता और अदालत केवल FIR की सामग्री के आधार पर ही निर्णय लेगी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ का बड़ा आदेश
यह फैसला चीफ जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन जजों की पीठ ने सुनाया। इस दौरान अदालत ने महाराष्ट्र के बॉम्बे हाईकोर्ट का वह आदेश भी रद्द कर दिया जिसमें आरोपी को अग्रिम जमानत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से जांच की, जो कि अग्रिम जमानत की सुनवाई में संभव नहीं है। अग्रिम जमानत पर विचार करते समय केवल यह देखना होगा कि FIR में दर्ज आरोपों के आधार पर प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट की धारा-18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक है। लेकिन अगर किसी मामले में दर्ज आरोप इतने कमजोर हों कि SC/ST एक्ट की धारा-3 लागू ही न हो सके, तो अदालत अग्रिम जमानत देने पर विचार कर सकती है। इसका मतलब यह है कि अगर FIR में लगाए गए आरोप बेबुनियाद हों, या उनमें अपराध के तत्व ही न हों, तभी आरोपी को राहत दी जा सकती है।
सामाजिक न्याय की रक्षा और दुरुपयोग पर रोक
अदालत ने यह भी कहा कि SC/ST एक्ट सामाजिक न्याय का कानून है, जिसे कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है। इसका मकसद दलित और आदिवासी समुदाय को सुरक्षा देना है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह कानून जितना जरूरी है, उतना ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि इसका दुरुपयोग न हो। इसलिए अदालत ने साफ किया कि वास्तविक मामलों में आरोपी को किसी तरह की राहत नहीं मिलेगी, लेकिन झूठे मामलों में निर्दोष व्यक्ति को बचाने का रास्ता खुला रहेगा।
फैसले का महत्व
यह फैसला महाराष्ट्र के उस मामले से जुड़ा है, जहाँ बॉम्बे हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत दी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब देशभर की निचली अदालतों को यह देखना होगा कि क्या दर्ज FIR में वास्तव में अपराध का आधार मौजूद है। अगर FIR ही कमजोर है, तभी अग्रिम जमानत दी जा सकेगी। यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि कानून की आड़ में किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय न हो।
