नई दिल्ली: देश के कॉर्पोरेट सेक्टर में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों ने एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। हीरो फ्यूचर एनर्जीज (Hero Future Energies) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के खिलाफ दर्ज एफआईआर से लेकर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), आनंद राठी और महिंद्रा जैसे बड़े कॉर्पोरेट नामों से जुड़े विवादों तक, एक पैटर्न साफ नजर आता है—शिकायत करने वाली महिला को न्याय पाने के लिए लंबी और जटिल लड़ाई लड़नी पड़ती है। सवाल सिर्फ घटनाओं का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है जो सुरक्षा देने के लिए बना, लेकिन अब उसी की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
हीरो फ्यूचर एनर्जीज मामला: एफआईआर, कोर्ट की सख्ती और जांच पर निगरानी
दिल्ली में सामने आया हीरो फ्यूचर एनर्जीज का मामला इस बहस के केंद्र में है। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीवत्सन अय्यर और एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ महिला कर्मचारी ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। मामला दर्ज होने के बावजूद जांच की रफ्तार पर सवाल उठे। पीड़िता को न्याय के लिए साकेत जिला अदालत का रुख करना पड़ा। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि सीईओ से अब तक कोई ठोस पूछताछ नहीं हुई है और जांच अधिकारी ने यह जानकारी भी दी कि आरोपी विदेश में हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि सीईओ से पूछताछ सुनिश्चित की जाए और सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) स्तर पर इसकी निगरानी की जाए।इस पूरे मामले में कंपनी की आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप साबित होने के बावजूद सीमित कार्रवाई—जैसे चेतावनी और संवेदनशीलता प्रशिक्षण—की सिफारिश की गई। पीड़िता का यह भी कहना है कि शिकायत के बाद उसके कामकाज में बाधा डाली गई, ईमेल एक्सेस रोका गया और कार्यालय आने से मना किया गया। यह स्थिति बताती है कि जब शीर्ष प्रबंधन ही आरोपों के घेरे में हो, तो आंतरिक जांच की निष्पक्षता पर संदेह बढ़ जाता है।
टीसीएस, आनंद राठी और महिंद्रा: अलग केस, लेकिन मिलती-जुलती चुनौतियां
हीरो फ्यूचर एनर्जीज का मामला अकेला नहीं है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) से जुड़े एक विवाद में भी महिला कर्मचारी ने कार्यस्थल पर असमान व्यवहार और उत्पीड़न से जुड़ी शिकायत की, जिसके बाद कंपनी के शिकायत निवारण तंत्र को लेकर सवाल उठे। इसी तरह, आनंद राठी समूह से जुड़े एक मामले में जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर विवाद सामने आया। वहीं महिंद्रा समूह से जुड़े एक प्रकरण में महिला कर्मचारी ने शिकायत के बाद प्रताड़ना और करियर पर असर पड़ने की बात कही। इन मामलों में एक समान पैटर्न दिखता है—शिकायत दर्ज होने के बाद भी पीड़ित को ही अपनी स्थिति साबित करने और सिस्टम से लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जबकि कंपनियां अक्सर अपनी साख बचाने के दबाव में दिखती हैं।
पॉश अधिनियम, 2013: कागज पर मजबूत कानून, लेकिन अमल में चुनौतियां
भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए पॉश अधिनियम, 2013 लागू किया गया था। इसके तहत हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) बनाना अनिवार्य है। लेकिन जमीनी स्तर पर इस कानून के क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल सामने आते हैं। कई मामलों में आईसीसी की स्वतंत्रता संदिग्ध मानी जाती है, क्योंकि इसके सदस्य उसी संस्थान से जुड़े होते हैं। इससे निष्पक्ष जांच पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, मामलों के निपटारे में देरी और दोष सिद्ध होने पर भी हल्की कार्रवाई जैसी समस्याएं बार-बार सामने आती हैं। हीरो फ्यूचर एनर्जीज का मामला इन चुनौतियों को स्पष्ट रूप से सामने लाता है।
पीड़ित के अधिकार: जब कंपनी का सिस्टम साथ न दे तो क्या करें?
ऐसी स्थिति में पीड़ित के पास कई कानूनी विकल्प मौजूद होते हैं। सबसे पहले आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) में शिकायत दर्ज की जा सकती है। यदि वहां संतोषजनक कार्रवाई नहीं होती, तो पॉश अधिनियम के तहत स्थानीय समिति से संपर्क किया जा सकता है। गंभीर मामलों में पुलिस में एफआईआर दर्ज कराना और न्यायालय का रुख करना भी विकल्प है। इसके अलावा, लेबर कोर्ट और औद्योगिक न्यायाधिकरण में अपील कर रोजगार सुरक्षा और अन्य राहत मांगी जा सकती है। हीरो फ्यूचर एनर्जीज मामले में पीड़िता ने इन कानूनी रास्तों का सहारा लेते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की, जिसके बाद अदालत ने जांच की निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
झूठी शिकायत बनाम असली पीड़ित: कानून क्या कहता है?
पॉश अधिनियम में झूठी शिकायतों को लेकर भी प्रावधान मौजूद हैं। यदि यह साबित हो जाए कि शिकायत जानबूझकर और दुर्भावना से की गई है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि हर वह मामला जिसमें आरोप सिद्ध नहीं हो पाए, उसे झूठी शिकायत नहीं माना जा सकता। इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में कोई बाधा न आए और साथ ही किसी निर्दोष व्यक्ति के साथ अन्याय भी न हो। टीसीएस जैसे मामलों में यही संतुलन सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है—जहां एक ओर शिकायत की गंभीरता है, वहीं दूसरी ओर जांच की निष्पक्षता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
