नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने NEET-PG 2025 के लिए क्वालिफाइंग कटऑफ प्रतिशत घटाने के फैसले पर केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका में इस निर्णय को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि कटऑफ में भारी कमी से मेडिकल शिक्षा के स्तर और मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और केंद्र से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे, ने कहा कि मामला सीधे तौर पर शिक्षा के मानकों से जुड़ा है और यह देखना जरूरी है कि कहीं इन मानकों से समझौता तो नहीं हो रहा। कोर्ट ने कहा कि जिस तरीके से कटऑफ कम किया गया, उसे देखकर वह हैरान है, क्योंकि यह परीक्षा देने वाले सभी उम्मीदवार पहले से डॉक्टर हैं। यह मामला उस नोटिस से जुड़ा है जो 13 जनवरी को नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) ने जारी किया था। इसमें बताया गया था कि केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के निर्देश पर NEET-PG 2025 के लिए क्वालिफाइंग कटऑफ घटाया गया है। संशोधित नियमों के तहत सामान्य वर्ग के लिए कटऑफ 276 से घटाकर 103 कर दिया गया है, जबकि SC, ST और OBC वर्ग के लिए यह 235 से घटाकर माइनस 40 कर दिया गया है। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि यह मामला पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटों से जुड़ा है और सभी उम्मीदवार योग्य डॉक्टर हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन का स्तर चिंताजनक है और यह समझना जरूरी है कि ऐसा फैसला क्यों लिया गया।
याचिका में उठाए गए सवाल और मेरिट पर बहस
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि कटऑफ में इतनी बड़ी कमी से ऐसे उम्मीदवार भी पात्र हो जाएंगे जिनकी योग्यता स्पष्ट रूप से साबित नहीं है। याचिका में कहा गया कि पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में न्यूनतम योग्यता के मानकों को कम करना मनमाना और असंवैधानिक है तथा यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है। याचिका में यह भी कहा गया कि इस फैसले से मेडिकल शिक्षा के उच्च स्तर पर मेरिट कमजोर होगी, कम योग्यता वाले डॉक्टरों को बढ़ावा मिलेगा और इससे मरीजों की सुरक्षा व सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सीधा खतरा पैदा हो सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट में कहा कि पोस्टग्रेजुएट एडमिशन में अंक केवल असाधारण परिस्थितियों में ही थोड़े बहुत कम किए जा सकते हैं और वह भी सीमित प्रतिशत तक। उन्होंने बताया कि नियमों के अनुसार न्यूनतम योग्यता 50वां पर्सेंटाइल तय है और इसे सीधे माइनस 40 तक नहीं ले जाया जा सकता। जब केंद्र की ओर से कहा गया कि अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट सीटों में फर्क है, तो याचिकाकर्ता पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा के उच्च स्तर पर मानक और ज्यादा सख्त होने चाहिए, न कि कम।
