IMA ने आंध्र प्रदेश सरकार के फैसले पर जताई सख्त नाराजगी, कहा— आयुर्वेदिक डॉक्टरों को सर्जरी की अनुमति मरीजों के लिए खतरा

विजयवाड़ा: आंध्र प्रदेश सरकार के उस फैसले पर देशभर में बहस तेज हो गई है, जिसमें आयुर्वेदिक डॉक्टरों को चुनिंदा सर्जरी स्वतंत्र रूप से करने की अनुमति दी गई है। भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) ने इस निर्णय को “बड़ी गलती” बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। IMA का कहना है कि सर्जरी जैसे गंभीर मेडिकल कार्य के लिए आधुनिक चिकित्सा की लंबी और विशेष ट्रेनिंग जरूरी होती है, और इस फैसले से मरीजों की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ सकता है।

58 सर्जरी की अनुमति से बढ़ा विवाद

आंध्र प्रदेश सरकार ने 24 दिसंबर 2025 को यह फैसला लिया था। स्वास्थ्य मंत्री सत्या कुमार यादव ने पोस्टग्रेजुएट प्रशिक्षित आयुर्वेदिक डॉक्टरों को 58 तरह की सर्जिकल प्रक्रियाएं करने की अनुमति दी। सरकार का कहना है कि यह निर्णय केंद्र सरकार की 2020 की गाइडलाइंस और National Commission for Indian Systems of Medicine (NCISM) के नियमों के अनुसार है। इस फैसले के तहत शल्य तंत्र में 39 और शलाक्य तंत्र यानी कान, नाक, गला और आंखों से जुड़ी 19 प्रक्रियाएं शामिल हैं। इनमें घाव सिलाई, बवासीर और फिशर का इलाज, सिस्ट निकालना, स्किन ग्राफ्टिंग, मोतियाबिंद ऑपरेशन और टॉन्सिल सर्जरी जैसी प्रक्रियाएं शामिल बताई गई हैं। सरकार का तर्क है कि इससे दूर-दराज के इलाकों में डॉक्टरों की कमी दूर होगी और मरीजों को इलाज जल्दी मिल सकेगा।

IMA की चेतावनी और ‘मिक्सोपैथी’ पर सवाल

IMA अध्यक्ष डॉ. दिलीप पी. भानुशाली ने इस फैसले को बेहद चिंताजनक बताया है। उन्होंने साफ कहा कि IMA आयुर्वेद और होम्योपैथी का सम्मान करता है, लेकिन इन्हें उनके मूल और शुद्ध रूप में ही आगे बढ़ाया जाना चाहिए। डॉ. भानुशाली के अनुसार सर्जरी कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है, इसके लिए लगभग 10 साल की विशेष ट्रेनिंग और अनुभव की जरूरत होती है।
IMA का कहना है कि यह फैसला “मिक्सोपैथी” को बढ़ावा देगा, जिससे न सिर्फ आधुनिक चिकित्सा बल्कि आयुर्वेद दोनों की गरिमा को नुकसान पहुंचेगा। संगठन ने बताया कि इस मुद्दे पर वह स्वास्थ्य मंत्री और प्रधानमंत्री को पत्र लिखेगा और सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी PIL पहले से लंबित है। गौरतलब है कि 2020 में केंद्र सरकार द्वारा आयुर्वेदिक पोस्टग्रेजुएट्स को सर्जरी ट्रेनिंग की अनुमति दिए जाने के बाद से ही यह विवाद चला आ रहा है। कुछ राज्यों में इसे लागू भी किया गया, लेकिन IMA और चिकित्सा जगत का एक बड़ा वर्ग अब भी इसे मरीजों की सुरक्षा के लिहाज से गलत मान रहा है।

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