कल्लाझागर मंदिर मामला: मंदिर फंड के इस्तेमाल पर मद्रास हाईकोर्ट की DMK सरकार को कड़ी फटकार

मदुरै: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने तमिलनाडु की DMK सरकार और हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि राज्य सरकार को मंदिर के धन को अपनी मर्जी से खर्च करने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि बिना कानूनी अनुमति मंदिर के पैसों का इस्तेमाल करना “देवता के खिलाफ अपराध” है। यह टिप्पणी 108 दिव्यदेशम में शामिल ऐतिहासिक श्री कल्लाझागर मंदिर से जुड़े मामले में दी गई।

मंदिर को ‘सरकारी प्रोजेक्ट’ बनाना असंवैधानिक: कोर्ट

इस मामले में तमिलनाडु सरकार ने श्री कल्लाझागर मंदिर को अपने तथाकथित ‘आइकॉनिक प्रोजेक्ट’ में शामिल कर लिया था। इसके तहत मंदिर के सरप्लस फंड से पहले लगभग ₹92 करोड़, और बाद में संशोधित कर ₹40 करोड़ की लागत से टॉयलेट, गेस्ट हाउस, डाइनिंग हॉल, दुकानें, पार्किंग, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट सहित अन्य निर्माण कार्य प्रस्तावित किए गए थे। मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस अनिता सुमंत और जस्टिस सी. कुमारप्पन शामिल थे, ने इस पूरी योजना को गलत ठहराते हुए कहा कि HR&CE विभाग ने मंदिर को एक रियल एस्टेट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की तरह देखना शुरू कर दिया है, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिर कोई सरकारी विकास परियोजना नहीं है, “डेवलपमेंट” और “अपग्रेडेशन” जैसे शब्द मंदिर की मूल प्रकृति से मेल नहीं खाते, और राज्य सरकार को मंदिर के नाम पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट घोषित करने या मंदिर के धन के उपयोग को लेकर एकतरफा निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है।

13 साल से ट्रस्टी बोर्ड नहीं, HR&CE ने कानून का उल्लंघन किया

कोर्ट ने HR&CE विभाग पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि पिछले 13 वर्षों से श्री कल्लाझागर मंदिर में ट्रस्टी बोर्ड का गठन ही नहीं किया गया, जबकि मंदिर की वार्षिक आय करोड़ों रुपये में है और यह स्पष्ट रूप से HR&CE एक्ट की धारा 47(iii) के अंतर्गत आता है। इसके बावजूद मंदिर का संचालन एक Fit Person और एक Executive Officer के माध्यम से किया जा रहा था। कोर्ट ने इस व्यवस्था को “कानून की व्यवस्था का मज़ाक” बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि Executive Officer की नियुक्ति केवल अस्थायी और आपात परिस्थितियों में ही हो सकती है, न कि स्थायी रूप से। कोर्ट ने यह भी पाया कि HR&CE एक्ट की धारा 86 के तहत बजट तैयार नहीं किया गया, पिछले तीन वित्तीय वर्षों से कोई ऑडिट नहीं हुआ, खर्चों में किसी प्रकार की पारदर्शिता नहीं रही और अधिकारियों को कानून द्वारा तय की गई सीमाओं तक की जानकारी नहीं थी। इन सभी तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को “लापरवाह और गैर-जिम्मेदार” करार दिया।

₹45 करोड़ गायब, आदेश रद्द, निर्माण कार्य पर रोक

फैसले का सबसे गंभीर पहलू मंदिर के धन में आई भारी गिरावट को लेकर रहा। कोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में मंदिर के पास लगभग ₹107.6 करोड़ का सरप्लस फंड मौजूद था, जो वर्ष 2024 में घटकर ₹62 करोड़ रह गया। यानी करीब ₹45 करोड़ की राशि एक ही साल में खर्च कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि यह खर्च बिना बजट बनाए, बिना किसी कानूनी मंजूरी और बिना ट्रस्टी बोर्ड की अनुमति के किया गया, जो पूरी तरह अवैध है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मंदिर का सारा धन देवता की संपत्ति होता है, न कि सरकार, HR&CE विभाग, किसी मंत्री या अधिकारी की। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने G.O. Ms. No.135 (दिनांक 8 मार्च 2024) को रद्द कर दिया, 11 अक्टूबर 2024 के कार्यादेश को भी निरस्त कर दिया और सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी। साथ ही, भविष्य के लिए मंदिर प्रशासन को यह निर्देश दिए गए कि वह संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही कोई निर्णय ले। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला पूरे तमिलनाडु के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य में सैकड़ों मंदिर लंबे समय से HR&CE के नियंत्रण में हैं और वहां भी ट्रस्टी बोर्ड गठित नहीं किए गए हैं। अंत में कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि “नियमन का मतलब नियंत्रण या कब्जा नहीं होता।”


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The Commune

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