लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश तेज हो गई है। लगभग 11–13 प्रतिशत आबादी वाले ब्राह्मण मतदाता 70 से अधिक सीटों पर प्रभाव रखते हैं। इसी कारण भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सभी दल ब्राह्मण समाज को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।
ब्राह्मण समाज को लेकर बढ़ी राजनीतिक हलचल
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं को राजनीति में ओपिनियन मेकर यानी राय बनाने वाला वर्ग माना जाता है। सवर्ण मतदाताओं में ब्राह्मण सबसे बड़ा वोट बैंक माने जाते हैं और आमतौर पर हर राजनीतिक दल 40 से 60 सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारता रहा है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने लगभग 50 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जबकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने करीब 45–50 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 60 से अधिक ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। हाल के दिनों में यूजीसी नियमों और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद के बाद ब्राह्मण राजनीति से जुड़े नेता सतर्क हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी यह विवाद पूरी तरह शांत नहीं हुआ है और सभी राजनीतिक दल अपनी स्थिति स्पष्ट करके ब्राह्मण मतदाताओं को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बीच भाजपा के ब्राह्मण विधायकों और एमएलसी की डिनर बैठक भी काफी चर्चा में रही, जिसे ब्राह्मण समाज में बढ़ रहे असंतोष से जोड़कर देखा गया। माना जा रहा है कि जनप्रतिनिधि अपने समाज को अपनी पार्टी के साथ बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने बटुक सम्मान कार्यक्रम आयोजित किया, जबकि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने माघ मेले में हुई घटना को गलत बताया।
सभी दल ब्राह्मणों को साधने में जुटे
ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए अलग-अलग राजनीतिक दल अपनी रणनीति बना रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी को वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण वोटों से बड़ी सफलता मिली थी और अब पार्टी एक बार फिर ब्राह्मण मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। बसपा प्रमुख मायावती ने हाल ही में ब्राह्मण समाज को उचित सम्मान देने की बात कही थी। इसके अलावा एक फिल्म के नाम को लेकर हुए विवाद में भी बसपा ने ब्राह्मण समाज के हितों का समर्थन किया। वहीं समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण मतदाताओं को साधने में जुटी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव जहां पीडीए रणनीति पर काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित कराए जा रहे हैं और परशुराम की मूर्तियों के जरिए ब्राह्मण समाज के प्रति अपनत्व का संदेश दिया जा रहा है। उधर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी इस मुद्दे पर सक्रिय है। कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने शंकराचार्य विवाद पर पार्टी की स्थिति स्पष्ट की है। लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में अजय राय के साथ अविनाश पांडे भी मौजूद रहे, जिससे ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश साफ दिखाई देती है।
