पटना: बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही जाति जनगणना एक बार फिर सियासत के केंद्र में आ गई है। सभी राजनीतिक दल इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने में जुट गए हैं। एक तरफ सवर्ण वर्ग का कहना है कि आरक्षण व्यवस्था ने सिस्टम को असंतुलित कर दिया है, वहीं दलित, पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग इसे अपने अधिकारों की बहाली का मौका मान रहा है। नेताओं के बयानों और जनसभाओं में अब “जाति और जनगणना” सबसे गर्म मुद्दा बन चुका है।
बिहार में कैसे शुरू हुई जाति जनगणना की कहानी
2023 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी CM तेजस्वी यादव की महागठबंधन सरकार ने राज्यस्तरीय जातीय सर्वे कराया था। 2 अक्टूबर 2023 को जारी रिपोर्ट में यह साफ हुआ कि बिहार में आर्थिक असमानता जातियों के अनुपात में गहराई तक फैली है। यह आज़ादी के बाद देश का पहला ऐसा सर्वे था जो राज्य स्तर पर जातीय आधार पर किया गया। इस रिपोर्ट के बाद केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को ऐलान किया कि 2026-27 में देशभर में जातीय जनगणना दो चरणों में की जाएगी।
यह फैसला दशकों पुराने 1931 के आखिरी जातीय जनगणना के बाद ऐतिहासिक माना जा रहा है।
सवर्ण समाज की राय — “जनगणना नहीं, आरक्षण खराब”
सारण के 29 वर्षीय प्रिंस रंजन सिंह (राजपूत) मेडिकल लैब में काम करते हैं। वे खुलकर विरोध करते हुए कहते हैं — “मेरे हिसाब से जनगणना गरीब की होनी चाहिए, जाति की नहीं। जो गरीब है, उसे दीजिए। आरक्षण जाति के नाम पर नहीं, गरीबी के आधार पर होना चाहिए। अब आरक्षण समाज को लंगड़ा कर रहा है।” पटना के सीता शरण (भूमिहार) मानते हैं कि जातीय गणना जरूरी है, लेकिन अधूरा सर्वे बेकार है। वे कहते हैं — “गिनती से किसी को नुकसान नहीं है। जिसकी जितनी आबादी है, उसे उसी हिसाब से मौका मिलना चाहिए। लेकिन अगर शिक्षा नहीं मिले तो आरक्षण से क्या फायदा?” वैशाली के टिंकू झा (ब्राह्मण) मजदूरी करके जीवन चलाते हैं। वे मानते हैं कि जाति जनगणना से किसी को नुकसान नहीं, पर असली मुद्दे बेरोजगारी और पलायन हैं। “लोग अगर बिहार में रोजगार पाते, तो चेन्नई, पंजाब या विशाखापट्टनम नहीं जाते।”
दलित और महादलित की राय — “आरक्षण नहीं, रोजगार चाहिए”
पटना यूनिवर्सिटी के छात्र रितिक (दलित) कहते हैं कि अब आरक्षण मजाक बन गया है। “जब सरकारी संस्थान ही नहीं रहेंगे, तो सरकारी नौकरी कहां होगी? आपने गिना कि 33% परिवार 6,000 रुपये से कम कमाते हैं, पर किया क्या?” सारण के खड़का टोला के दिलीप कुमार दास (महादलित, रविदास समाज) कहते हैं — “जाति जनगणना से हर समुदाय की पहचान होगी। इसी से सही योजना बनेगी। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं को अब फायदा छोड़ देना चाहिए।” दिलीप अपने बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाना चाहते हैं और मानते हैं कि “शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार” के साथ जातीय जनगणना भी जरूरी मुद्दा है।
OBC और EBC की राय — “अब हिसाब बराबर होगा”
60 वर्षीय किसान भोला प्रसाद यादव (सारण) कहते हैं — “सवर्णों का हर जगह कब्जा है, इसलिए वे विरोध करते हैं। बेरोजगारी और महंगाई तो हैं, लेकिन जाति जनगणना से भी फर्क पड़ेगा।” पटना यूनिवर्सिटी के छात्र गौतम कुमार (तेली, EBC) कहते हैं — “मोदी जी हमारी जाति के हैं, फिर भी हमें कोई फायदा नहीं मिला। जनगणना से जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण मिलना चाहिए।” उसी यूनिवर्सिटी के सूरज कुमार (OBC) का मानना है कि यह सर्वे “आरक्षण सुधार” का जरिया है। वे कहते हैं — “आरक्षण जाति के प्रतिशत देखकर ही तय होना चाहिए। जातीय सर्वे इसे मजबूत करेगा।” 20 वर्षीय शिव कुमार (OBC) का मानना है कि राजनीतिक दल इसे “जातिवाद फैलाने” का हथियार बनाएंगे। “जरूरी है कि ये जनगणना योजनाओं के लिए हो, न कि वोट बैंक के लिए।” मधुबनी के मजदूर विजेंद्र महतो (मल्लाह, EBC) कहते हैं — “गणना से नेताओं को पता चलेगा कि कौन बेरोजगार है। आरक्षण बढ़े तो सबको फायदा होगा।”
कुर्मी और कोहरी समाज की राय
सारण के रंजन कुमार (कुर्मी), जो PWD ठेकेदार हैं, कहते हैं — “जनसंख्या के हिसाब से नौकरियों और सुविधाओं का बंटवारा होना चाहिए। पर यह चुनाव का बड़ा मुद्दा नहीं, लोग सरकार बदलने के मूड में हैं।” वहीं गुंजन कुमार (कोहरी) राशन की दुकान चलाते हैं। “सबसे ज्यादा OBC हैं, पर नौकरी में कम हैं। निचली कास्ट को ज्यादा फायदा, ऊपर वालों को कम। बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है।”
मुस्लिम समाज की राय — “चुनावी जाल, पर सामाजिक ज़रूरत”
पटना यूनिवर्सिटी की तस्लीमा अरशद कहती हैं — “जातीय जनगणना जरूरी है, ताकि पिछड़ी जातियों की संख्या और हालात पता चलें। पर चुनाव के वक्त इसे सिर्फ वोट लेने के लिए उठाया जाता है।” सारण के मोहम्मद सुल्तान (ऑटो ड्राइवर) कहते हैं — “इस सरकार में हिंदू-मुस्लिम की राजनीति हुई। अगर जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण मिलेगा, तो मेरे बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा।”
एक्सपर्ट की राय — “सभी पार्टियां क्रेडिट की दौड़ में”
पटना के पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं — “बिहार में अब जातीय जनगणना विरोध का विषय नहीं। सब पार्टियां इसे चाहती हैं। नीतीश-तेजस्वी ने सर्वे कराया, लेकिन अब BJP ने उससे बड़ी चाल चल दी — केंद्र में जनगणना की घोषणा कर दी।” वे मानते हैं कि इस बार “क्रेडिट की होड़” चुनावी समीकरण तय करेगी। “महागठबंधन इसे भुनाने की कोशिश करेगा, पर फायदा नीतीश कुमार को ज्यादा मिलेगा।”
राजनीतिक दलों की स्थिति
JDU: “न्याय के साथ सबका विकास” JDU प्रवक्ता अंजुम आरा कहती हैं — “नीतीश कुमार ने ही बिहार में जातिगत सर्वे कराया था। उन्होंने हर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित की। ये बिहार मॉडल अब पूरे देश में लागू हो रहा है।” BJP: “हमेशा आरक्षण के साथ” BJP प्रवक्ता प्रभात मालवार कहते हैं — “BJP ने हमेशा आरक्षण का समर्थन किया है — चाहे मंडल हो या कमंडल। हमने अति पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया और टिकट वितरण में जातीय संतुलन रखा है।”RJD: “सरकार बनी तो आरक्षण 75% करेंगे” RJD प्रवक्ता एजाज अहमद कहते हैं — “लालू और तेजस्वी यादव ने इस मुद्दे को सड़क से लेकर सदन तक उठाया। अगर RJD की सरकार बनी, तो आरक्षण 75% किया जाएगा और 10% EWS जोड़कर कुल 85% आरक्षण को नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाएगा।”
निचोड़ — “बिहार की राजनीति अब आंकड़ों की नहीं, पहचान की लड़ाई है”
जाति जनगणना ने बिहार की राजनीति को दो हिस्सों में बांट दिया है — एक तरफ वे हैं जो कहते हैं “आरक्षण से नुकसान”,
दूसरी तरफ वे जो कहते हैं “अब सबका हिसाब होगा।” पटना, सारण और वैशाली से लेकर मधुबनी तक, हर गांव और कस्बे में यह चर्चा है कि “गिनती अब सिर्फ वोट की नहीं, हक़ की है।” बिहार का यह चुनाव इसलिए खास है — क्योंकि यह तय करेगा कि अगली सरकार जाति की गिनती से बनेगी या जनता की उम्मीदों से।
