दिल्ली: भारत का रुपया शुक्रवार (21 नवंबर 2025) को अचानक फिसलकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 89.48 पर पहुँच गया—जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। लोगों के लिए यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि रोजमर्रा की चीज़ों के महँगे होने की आहट है—चाहे वह आयातित तेल हो, इलेक्ट्रॉनिक्स हों या विदेशी शिक्षा। मुंबई और दिल्ली के मुद्रा बाज़ारों में इस गिरावट को देखकर ट्रेडरों तक ने स्वीकारा कि मामला “हैरानी भरा और चिंताजनक” हो चुका है।
RBI का सीमित हस्तक्षेप और बाज़ार दबाव—कैसे टूटा रुपया
रुपया गुरुवार के 88.68 के मुकाबले करीब 80 पैसे गिरा। दिन की शुरुआत में यह 88.83 पर था, लेकिन कुछ घंटों के भीतर तेजी से टूटकर 89.48 पर आ गया। ट्रेडरों ने बताया कि 88.80 का स्तर पिछले कई दिनों से एक मजबूत सुरक्षा रेखा था, लेकिन शुक्रवार को यह लाइन टूटते ही डॉलर की मांग अचानक बढ़ी और रुपये पर दबाव तेज हो गया। बाज़ार में यह भी माना जा रहा है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने विदेशी मुद्रा बाज़ार में अपने हस्तक्षेप को हाल ही में कम किया है, जिससे रुपये के लिए समर्थन कमजोर पड़ गया है। साथ ही निर्यातकों की ओर से डॉलर की मजबूत सप्लाई नहीं आई, जबकि आयातकों की ओर से डॉलर खरीदने की गतिविधि बढ़ती रही। बार्कलेज़ के एशिया FX & EM मैक्रो स्ट्रैटेजी प्रमुख मितुल कोठेचा ने कहा कि पिछले काफी समय से डॉलर खरीदने की जमा हुई मांग थी, जो आज एक साथ सामने आई। उन्होंने कहा कि RBI कई दिनों तक 89 के नीचे रुपया रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन आज वह लाइन भी टूट गई—और यह कई निवेशकों के लिए आश्चर्यजनक थ
विदेशी निवेश की वापसी और वैश्विक घटनाओं का असर
रुपये पर यह दबाव अचानक नहीं आया बल्कि अगस्त से लगातार बन रहा है, जब अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर भारी शुल्क लगाया था—इसके बाद विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ार से 2025 में अब तक 16.5 अरब डॉलर वापस खींच लिए हैं। इससे एशिया की अन्य मुद्राओं के मुकाबले रुपया सबसे कमजोर में गिना जाने लगा है। इस बीच अमेरिकी बाज़ारों में भी निवेशकों ने जोखिम से बचने की प्रवृत्ति अपनाई और सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख किया, जिससे डॉलर और मजबूत हुआ और रुपया कमजोर। कई निवेशकों ने कहा कि पिछले हफ्तों में जिस तरह 89 से नीचे एक सीमा बनी हुई थी, उसके आज टूट जाने से बाज़ार थोड़ा असहज महसूस कर रहा है और आगे RBI के कदम पर सभी की नज़र रहेगी।
