लखनऊ में मिस्त्री को झूठी FIR दर्ज कराने पर 6 महीने की जेल, SC/ST एक्ट का गलत इस्तेमाल साबित

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की एक विशेष अदालत ने मंगलवार को एक अहम फैसला सुनाया। अदालत ने मिस्त्री मैकू लाल को छह महीने की सजा दी है। उसने घर मालिकों पर झूठा आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था। अदालत ने माना कि यह पूरा मामला झूठा था और आरोपी ने इस कानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों को परेशान करने के लिए किया। अदालत का यह फैसला उन सभी के लिए सबक माना जा रहा है जो व्यक्तिगत दुश्मनी या पैसे ऐंठने के लिए ऐसे गंभीर कानून का दुरुपयोग करने की कोशिश करते हैं।

मकान निर्माण से शुरू हुआ विवाद

मामला लखनऊ के शीतलापुरम, थाना पारा क्षेत्र का है। यहाँ सुमित कालरा और अमित कालरा ने साल 2016 में अपने मकान के निर्माण के लिए मिस्त्री मैकू लाल को काम पर रखा था। काम के दौरान भुगतान को लेकर विवाद हुआ और इसके बाद 9 मई 2017 को मैकू लाल ने आलमनगर थाने में FIR दर्ज कराई। अपनी शिकायत में उसने आरोप लगाया कि 10 मार्च 2017 को कालरा परिवार ने उसका ₹1,77,603 बकाया नहीं चुकाया। उसने कहा कि उसे केवल ₹3,05,100 मिले और बाकी रकम रोक दी गई। इसके साथ ही उसने दावा किया कि उस दिन घर मालिकों ने उसे जातिसूचक शब्दों से गालियाँ भी दीं।

जांच में हुआ बड़ा खुलासा

यह मामला आलमबाग की तत्कालीन क्षेत्राधिकारी (सीओ) मीनाक्षी को जांच के लिए सौंपा गया। उन्होंने मोबाइल कॉल डिटेल्स और गवाहों के बयान इकट्ठे किए। जांच के बाद साफ हुआ कि 10 मार्च 2017 को जिस दिन घटना होने का दावा किया गया था, उस दिन मैकू लाल कालरा परिवार के घर मौजूद ही नहीं था। इतना ही नहीं, कालरा परिवार के पड़ोसियों ने भी यह कहा कि ऐसी कोई घटना वहाँ नहीं हुई थी। इसके बाद 4 जून 2017 को सीओ ने अदालत में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की और बताया कि मैकू लाल ने झूठी FIR दर्ज कराई थी ताकि वह घर मालिकों पर दबाव बनाकर उनसे ज्यादा पैसे निकलवा सके।

अदालत का निर्णय और टिप्पणी

विशेष SC/ST एक्ट कोर्ट के जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने मंगलवार को फैसला सुनाते हुए मैकू लाल को दोषी करार दिया और छह महीने की कैद की सजा सुनाई। हालाँकि, सजा तीन साल से कम होने की वजह से अदालत ने उसे जमानत भी दे दी। फैसला सुनाते समय अदालत ने कहा कि भारतीय आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत यह है कि सौ दोषी छूट जाएँ लेकिन एक भी निर्दोष को सजा न मिले। जब कोई व्यक्ति झूठी FIR दर्ज करता है, तो यह सिद्धांत कमजोर पड़ता है, और यह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

सरकार की प्रतिक्रिया

राज्य सरकार की ओर से मामले की पैरवी कर रहे सरकारी वकील अरविंद मिश्रा ने कहा कि अदालत का यह फैसला उन लोगों के लिए नसीहत है जो SC/ST एक्ट जैसे गंभीर कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत फायदे या बदला लेने के लिए करना चाहते हैं। यह निर्णय समाज को यह संदेश देता है कि झूठे मुकदमों के जरिए निर्दोष लोगों को फँसाने की कोशिश करने वालों को कानून माफ नहीं करेगा।

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