मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने एक अहम नीतिगत फैसला लेते हुए राज्य के सभी निजी विश्वविद्यालयों और स्ववित्तपोषित शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था को अनिवार्य कर दिया है। महाराष्ट्र प्राइवेट यूनिवर्सिटीज एक्ट, 2023 के प्रमुख प्रावधानों को लागू करते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि अब बिना सरकारी सहायता चलने वाले प्रोफेशनल कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों को भी प्रवेश प्रक्रिया के दौरान राज्य की आरक्षण नीति का पालन करना होगा। इस फैसले को उच्च शिक्षा में सामाजिक समानता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
अनुच्छेद 15(5) के तहत फैसला, अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट
सरकार ने इस निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 15(5) के तहत वैध बताया है। यह अनुच्छेद राज्यों को यह अधिकार देता है कि वे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में विशेष प्रावधान कर सकें। हालांकि, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को इस फैसले से बाहर रखा गया है, क्योंकि उन्हें संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अपने संस्थान चलाने की स्वतंत्रता प्राप्त है। सरकार ने साफ किया है कि यह आदेश केवल गैर-अल्पसंख्यक निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर लागू होगा।
SC, ST, OBC, EWS और SEBC सहित कुल आरक्षण लगभग 52 प्रतिशत
महाराष्ट्र में आरक्षण को लेकर पहले से ही स्पष्ट कानूनी व्यवस्था मौजूद है। महाराष्ट्र प्राइवेट प्रोफेशनल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (आरक्षण) एक्ट, 2006 और महाराष्ट्र राज्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (SEBC) एक्ट, 2024 के तहत SC, ST, विमुक्त जातियां , घुमंतू जनजातियां, OBC, विशेष पिछड़ा वर्ग (SBC), आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और SEBC को आरक्षण दिया जाता है। इन सभी श्रेणियों को मिलाकर राज्य में कुल आरक्षण लगभग 52 प्रतिशत तक पहुंचता है। सरकार का कहना है कि निजी संस्थानों में भी यही ढांचा लागू होगा, ताकि सभी वर्गों के छात्रों को समान अवसर मिल सकें।
CET और CAP से लागू होगी व्यवस्था, फीस और मेरिट को लेकर सवाल
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, आरक्षण को राज्य स्तरीय कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (CET) और केंद्रीकृत प्रवेश प्रक्रिया (CAP) के जरिए लागू किया जाएगा। यह व्यवस्था खास तौर पर मेडिकल, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसे प्रोफेशनल कोर्सों में प्रभावी होगी। जहां एक तरफ समर्थकों का कहना है कि निजी विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू होने से वंचित और पिछड़े वर्गों को उच्च शिक्षा में बेहतर पहुंच मिलेगी, वहीं दूसरी ओर आलोचकों ने निजी संस्थानों की स्वायत्तता, मेरिट आधारित दाखिले और संभावित फीस बढ़ोतरी को लेकर चिंता जताई है। इसके अलावा यह सवाल भी उठ रहा है कि आरक्षित वर्ग के छात्रों की फीस में मिलने वाली रियायत का आर्थिक बोझ कौन उठाएगा—राज्य सरकार या निजी संस्थान। यह मुद्दा पहले ही कानूनी जांच के दायरे में आ चुका है।
