छिंदवाड़ा: मध्य प्रदेश से जुड़े एक गंभीर मामले में बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है। अदालत ने नाबालिग दलित लड़की से दुष्कर्म के दोषी आरोपी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर आरोपी को पीड़िता की जाति की जानकारी थी, तो यह बात SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त है। यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि 2016 के संशोधन के बाद अब यह साबित करना जरूरी नहीं है कि अपराध जातीय भेदभाव से प्रेरित था — सिर्फ पीड़िता की जाति का ज्ञान होना ही कानूनन पर्याप्त है।
क्या है पूरा मामला — छिंदवाड़ा जिले की घटना
यह मामला छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) के एक गांव का है, जहां रहने वाले एक युवक ने अपने ही इलाके की 15 वर्षीय अनुसूचित जाति की नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म किया था। पीड़िता और आरोपी एक-दूसरे को जानते थे, और दोनों एक ही गांव के रहने वाले थे।घटना के बाद पीड़िता के परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद आरोपी पर POCSO एक्ट और SC/ST एक्ट की धाराओं में केस दर्ज हुआ। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा दी।बाद में आरोपी ने यह कहते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर) में अपील की कि अपराध जातीय आधार पर नहीं था, लेकिन हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अंतिम अपील दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी — अब मंशा साबित करने की जरूरत नहीं
जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस एस.वी. भट्टी की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने आरोपी की दलीलें खारिज करते हुए कहा कि — “2016 में हुए संशोधन के बाद अब यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि अपराध जातीय द्वेष या भेदभाव की भावना से किया गया। यदि आरोपी को पीड़ित की जाति की जानकारी थी और उसने अपराध किया, तो यह धारा 3(2)(v) के तहत सजा देने के लिए पर्याप्त है।” कोर्ट ने कहा कि आरोपी और पीड़िता एक ही गांव में रहते थे, इसलिए यह स्वाभाविक रूप से माना जा सकता है कि आरोपी को पीड़िता की जाति का ज्ञान था।
2016 का संशोधन — कानून में बड़ा बदलाव
2016 में SC/ST (Prevention of Atrocities) Act में संशोधन किया गया था। पहले कानून में यह जरूरी था कि अपराध जातीय आधार पर (on the ground of caste) किया गया हो। लेकिन संशोधन के बाद यह शर्त हटा दी गई और अब कानून कहता है — “यदि अपराध किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के खिलाफ किया गया है और आरोपी को उसकी जाति की जानकारी थी, तो यह अपराध माना जाएगा।” इस संशोधन के बाद अभियोजन पक्ष को अब यह साबित करने की जरूरत नहीं होती कि अपराध जातीय नफरत से प्रेरित था — सिर्फ यह दिखाना पर्याप्त है कि आरोपी को पीड़ित की जाति के बारे में पता था।
कोर्ट ने कहा — आरोपी को जाति की जानकारी थी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोपी और पीड़िता एक ही गांव के रहने वाले थे और उनके परिवार एक-दूसरे को जानते थे, इसलिए यह माना जा सकता है कि आरोपी को पीड़िता की जाति की जानकारी थी। कोर्ट ने इसे Section 8(c) के तहत एक “अनुमानित तथ्य” माना और कहा कि आरोपी इस अनुमान को गलत साबित नहीं कर सका। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने सही फैसला दिया था। “जब आरोपी को पीड़िता की जाति की जानकारी थी और उसने अपराध किया, तो यह धारा 3(2)(v) के तहत सजा के लिए पर्याप्त है।” इसलिए अदालत ने आरोपी की उम्रकैद की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा।
कानूनी असर — भविष्य के मामलों पर व्यापक प्रभाव
यह फैसला आने वाले समय में SC/ST और POCSO एक्ट से जुड़े कई मामलों में नजीर (precedent) बनेगा।
अब अभियोजन पक्ष को यह साबित नहीं करना होगा कि अपराध जातीय द्वेष से किया गया था — सिर्फ यह दिखाना होगा कि आरोपी को पीड़ित की जाति का ज्ञान था। इससे कानून और सख्त हो गया है और दलितों व आदिवासियों के खिलाफ अपराधों में न्याय की संभावना और मजबूत हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा — “अगर कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य के खिलाफ अपराध करता है और उसे उसकी जाति की जानकारी है, तो वह SC/ST एक्ट के तहत सख्त सजा का पात्र है, भले ही अपराध जातीय भावना से प्रेरित न हो।”
