कटरा (रियासी जिला):जम्मू-कश्मीर में स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में पढ़ रहे MBBS छात्रों की पढ़ाई अचानक रुक गई है। नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने कॉलेज की मान्यता रद्द कर दी है, जिसके बाद पहले बैच के सभी 50 छात्र अपने-अपने घर लौट चुके हैं। छात्रों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनकी आगे की पढ़ाई कहां और कैसे पूरी होगी। यह मेडिकल कॉलेज श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी के अंतर्गत संचालित होता है और वर्ष 2025 में पहली बार यहां MBBS कोर्स शुरू हुआ था। कॉलेज में कुल 50 सीटें थीं, जिनमें से 42 सीटों पर कश्मीरी मुस्लिम छात्रों, 7 सीटों पर हिंदू छात्रों और 1 सीट पर सिख छात्र ने दाखिला लिया था। इसी को लेकर कुछ हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई, जो बाद में बड़े विवाद का रूप ले गई।
छात्रों का कहना: नुकसान सिर्फ हमारा नहीं, पूरी पीढ़ी का है
कॉलेज की मान्यता रद्द होने के बाद सभी 50 छात्र गहरे असमंजस में हैं। छात्रों का कहना है कि यह नुकसान केवल कुछ छात्रों का नहीं, बल्कि पूरे मेडिकल एजुकेशन सिस्टम और आने वाली पीढ़ी का है। छात्रों ने ट्यूशन फीस के रूप में करीब 4.95 लाख रुपये जमा किए थे, जबकि हॉस्टल और अन्य शुल्क अलग से थे। पढ़ाई रुकने से छात्रों का समय, पैसा और मानसिक शांति — तीनों प्रभावित हुए हैं। छात्रों का यह भी कहना है कि कॉलेज नया जरूर था, लेकिन सुविधाएं कई पुराने मेडिकल कॉलेजों से बेहतर थीं। लाइब्रेरी, क्लासरूम, फैकल्टी और प्रैक्टिकल सुविधाएं संतोषजनक थीं। कुछ छात्राओं के अनुसार, एनाटॉमी के लिए पर्याप्त डेड बॉडी उपलब्ध थीं, जो कई मेडिकल कॉलेजों में नहीं होतीं।
विवाद की जड़: दान का पैसा और धर्म का सवाल
विवाद की शुरुआत तब हुई, जब वैष्णो देवी संघर्ष समिति ने कॉलेज में मुस्लिम छात्रों की अधिक संख्या पर आपत्ति जताई। समिति का दावा था कि यह कॉलेज माता वैष्णो देवी तीर्थ क्षेत्र में स्थित है और श्रद्धालुओं के दान से बनाया गया है, इसलिए यहां केवल हिंदू छात्रों को ही एडमिशन मिलना चाहिए। इस समिति में RSS और BJP से जुड़े संगठनों सहित 50 से अधिक संगठन शामिल बताए जाते हैं। बजरंग दल ने भी कॉलेज के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसके बाद जम्मू में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और मुस्लिम छात्रों को कॉलेज से हटाने की मांग उठने लगी।
सरकारी मदद के आंकड़े क्या कहते हैं
दस्तावेजों के अनुसार, श्री माता वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी को जम्मू-कश्मीर सरकार से बीते कई वर्षों से लगातार आर्थिक सहायता मिलती रही है। वित्तीय रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2017-18 में 10 लाख रुपये, 2018-19 में 50 लाख रुपये और 2019-20 में 5 करोड़ रुपये की ग्रांट दी गई। इसके बाद 2020-21 में 19.70 करोड़ रुपये, 2021-22 में 21 करोड़ रुपये, 2022-23 में 23 करोड़ रुपये, 2023-24 में 24 करोड़ रुपये और 2024-25 में 28 करोड़ रुपये की सहायता सरकार की ओर से प्रदान की गई। इस प्रकार, पिछले आठ वर्षों में कुल मिलाकर लगभग 121 करोड़ रुपये की सरकारी मदद यूनिवर्सिटी को मिली है। हालांकि, हिंदू संगठनों का दावा है कि इसके बावजूद यूनिवर्सिटी और मेडिकल कॉलेज का बड़ा खर्च अब भी श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड वहन करता है और सरकार की आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
NMC ने क्यों रद्द की कॉलेज की मान्यता
नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) की मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड की टीम ने 2 जनवरी 2026 को कॉलेज का निरीक्षण किया था, जिसमें कई गंभीर कमियां सामने आईं। निरीक्षण रिपोर्ट के अनुसार कॉलेज में टीचिंग फैकल्टी की लगभग 39 प्रतिशत कमी पाई गई, जबकि रेजिडेंट डॉक्टरों और ट्यूटरों की संख्या करीब 65 प्रतिशत तक कम थी। अस्पताल में मरीजों की संख्या निर्धारित मानकों से काफी कम पाई गई, वहीं OPD में आने वाले मरीज तय संख्या से आधे से भी कम थे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जहां बेड ऑक्यूपेंसी कम से कम 80 प्रतिशत होनी चाहिए थी, वहां यह केवल 45 प्रतिशत दर्ज की गई, और ICU में भी बेड ऑक्यूपेंसी बेहद कम पाई गई। इसके अलावा कई विभागों में प्रैक्टिकल और रिसर्च लैब की कमी थी, जबकि लाइब्रेरी में भी जरूरी किताबों और मेडिकल जर्नल्स की भारी कमी सामने आई। इन सभी खामियों के आधार पर NMC ने निष्कर्ष निकाला कि कॉलेज न्यूनतम आवश्यक मानकों को पूरा करने में असफल है, इसलिए उसकी मान्यता तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी गई।
छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया
NSUI के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट फिरोज खान ने कहा कि कॉलेज बंद होने से जम्मू-कश्मीर के छात्रों को भारी नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि यदि कॉलेज को माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन बनाना था, तो इसके लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। हिंदू-मुस्लिम के आधार पर छात्रों को बांटकर कॉलेज को विवाद में घसीटना उचित नहीं है।
