प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए एक दलित महिला और उसकी दो बहुओं को राज्य सरकार से मिले 4.5 लाख रुपये के मुआवजे को वापस करने का आदेश दिया है। साथ ही अदालत ने मामले में शामिल 19 आरोपियों पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम को कानून की प्रक्रिया का “गंभीर दुरुपयोग” और SC/ST एक्ट की “सद्भावनापूर्ण प्रावधानों का घोर दुरुपयोग”बताया।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज की, दुरुपयोग पर जताई कड़ी आपत्ति
गुरुवार को न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने रमेशर सिंह सहित 19 आरोपियों की उस आपराधिक अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने SC/ST एक्ट की धारा 14-A(1) के तहत विशेष न्यायाधीश, SC/ST एक्ट, प्रयागराज द्वारा जारी संज्ञान एवं समन आदेश को रद्द करने की मांग की थी। यह मामला IPC की गंभीर धाराओं और SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(va) से संबंधित था। FIR में दलित महिला और उसकी दो बहुओं ने आरोप लगाया था कि आरोपियों ने उनसे मारपीट की और उनकी गरिमा भंग करने की नीयत से बल प्रयोग किया।
FIR और गवाही पर उलझन, अदालत ने देखा विरोधाभास
4 नवंबर को सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील ने दावा किया कि FIR महिला की अंगूठे की छाप से दर्ज की गई थी। लेकिन शिकायतकर्ता की ओर से इस दावे को पूरी तरह नकार दिया गया। अदालत ने आशंका व्यक्त की कि शिकायतकर्ता—जो SC समुदाय से आती हैं—पर आरोपियों ने दबाव बनाया होगा। गुरुवार को तीनों पुलिस अधिकारी अदालत में पेश हुए। अदालत के विशेष प्रश्न पर महिला ने बताया कि उसका अंगूठा खाली कागज़ पर लिया गया था। दूसरी ओर, सरकारी वकील ने रिकॉर्ड दिखाया जिसमें FIR महिला द्वारा दिए गए लिखित आवेदन के आधार पर दर्ज थी।
जांच में FIR और गवाही सही पाई गई, महिलाओं को मिले थे 4.5 लाख
सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता और उसकी दोनों बहुओं के बयान धारा 161 और 164 CrPC के तहत दर्ज किए गए थे, और तीनों ने आरोपों की पुष्टि की थी। तीनों का मेडिकल परीक्षण भी हुआ था और SC/ST एक्ट की स्कीम के तहत उन्हें 1.5-1.5 लाख रुपये (कुल 4.5 लाख) का मुआवजा दिया गया था। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने गहरा असंतोष जताया कि अब वही महिला FIR से ही इंकार कर रही है, जबकि उसने न्यायिक बयान में आरोपों को स्वीकार किया था और सरकारी मुआवजा भी ले चुकी थीं। कोर्ट ने इसे राज्य के साथ “धोखाधड़ी” और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की “जानबूझकर कोशिश” माना।
