नई दिल्ली: देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रों की सामाजिक तस्वीर तेजी से बदल रही है। IIM उदयपुर के ताज़ा अध्ययन ने दिखाया है कि उच्च शिक्षा में अब सामान्य वर्ग पिछड़ रहा है । नामांकन में SC, ST और OBC वर्ग के छात्र 60 प्रतिशत से अधिक हो चुके हैं और 2023 में उन्होंने संख्या के मामले में सामान्य वर्ग को काफी पीछे छोड़ दिया है।
आरक्षित वर्ग का नामांकन बढ़ा, सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी घटी
उदयपुर, राजस्थान में स्थित IIM उदयपुर के सेंटर फॉर डेवलपमेंट पॉलिसी एंड मैनेजमेंट द्वारा किए गए अध्ययन में AISHE की 13 वर्षों की रिपोर्टों का विश्लेषण शामिल है। इसमें पाया गया कि 2010–11 में SC/ST/OBC की संयुक्त हिस्सेदारी 43.1 प्रतिशत थी, जो 2022–23 में तेजी से बढ़कर 60.8 प्रतिशत हो गई। सिर्फ वर्ष 2023 में ही आरक्षित वर्गों के छात्रों का नामांकन सामान्य वर्ग की तुलना में 95 लाख अधिक दर्ज किया गया। वहीं सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी जो 2011 में 57 प्रतिशत थी, वह गिरते-गिरते 2023 में केवल 39 प्रतिशत रह गई। सरकारी और निजी दोनों तरह के संस्थानों में यह बदलाव देखने को मिला है तथा निजी कॉलेजों में भी आरक्षित वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत हो चुकी है। इस अध्ययन में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के छात्रों को भी शामिल किया गया है ताकि उच्च शिक्षा की सामाजिक तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो सके।
देशभर के सभी राज्यों और विषयों में दिखा बड़ा सामाजिक बदलाव
इस अध्ययन के लिए 2010–11 से 2022–23 तक के 60,380 संस्थानों और 4.38 करोड़ छात्रों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। आंकड़ों से यह सिद्ध होता है कि सामाजिक संरचना में यह बदलाव किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। चाहे उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश हों या फिर उत्तर-पूर्व के राज्य—हर जगह आरक्षित वर्ग के छात्रों की बढ़ती उपस्थिति देखने को मिली है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि आरक्षित वर्ग के छात्र अब केवल आरक्षित सीटों पर ही नहीं रह गए, बल्कि अपनी योग्यता के बल पर सामान्य सीटों पर भी दाखिला ले रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि अब SC/ST/OBC वर्ग के लिए अवसरों की उपलब्धता कोई बड़ी चुनौती नहीं रही और उच्च शिक्षा में उनका प्रतिनिधित्व लगातार मजबूत हुआ है। दूसरी ओर, सामान्य वर्ग के छात्रों की संख्या हर वर्ष कम होने के संकेत मिलते रहे और यह प्रवृत्ति देशभर में लगभग समान है।
क्रीमी लेयर पर बहस और विशेषज्ञों की राय
रिपोर्ट में पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के बयान का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने SC और ST वर्गों में भी क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। उनका कहना था कि यदि आरक्षण का लाभ बार-बार एक ही परिवार को मिलता रहा, तो उस वर्ग के भीतर ही असमानता पैदा हो जाएगी और वे लोग पीछे रह जाएंगे जिन्हें वास्तव में मदद की जरूरत है। अध्ययन के प्रमुख लेखक प्रोफेसर वेंकटरमनन कृष्णमूर्ति का कहना है कि यह रिपोर्ट भारतीय उच्च शिक्षा में लंबे समय से चली आ रही इस धारणा को तोड़ती है कि सामान्य वर्ग का दबदबा सबसे अधिक है। उनके अनुसार अब नामांकन में SC, ST और OBC वर्ग का प्रभुत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और आरक्षित वर्ग के छात्रों ने सामान्य वर्ग को संख्या के मामले में बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है। सह-लेखक त्यागराजन का कहना है कि AISHE के आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट है कि अब अवसरों की उपलब्धता औसत से कहीं अधिक है और अब फोकस इस बात पर होना चाहिए कि क्रीमी लेयर की वजह से कमजोर वर्गों के वास्तविक अधिकार प्रभावित न हों।
