बिदर : कर्नाटक के बसवकल्याण में हुई सूफ़ी सन्तों की कॉन्फ़्रेंस में पूर्व बॉम्बे हाईकोर्ट जज बी.जी. कोलसे पाटिल ने फिर ऐसा बयान दिया जिसने माहौल गर्म कर दिया। MLC सलीम अहमद द्वारा आयोजित और कर्नाटक के पर्यावरण मंत्री ईश्वर खंड्रे द्वारा उद्घाटित इस कार्यक्रम में उन्होंने हिंदू धर्म, ब्राह्मणों और आरएसएस पर तीखे और भड़काऊ आरोप लगाए। उनके बयान के बाद पूरे इलाके में भारी नाराज़गी देखने को मिली और यह मामला फिर से राष्ट्रीय चर्चा में आ गया।
ब्राह्मणों पर निशाना, शब्द को बताया फ़ारसी गाली
बसवकल्याण में मंच संभालते ही कोलसे पाटिल ने दावा किया कि ‘हिंदू धर्म नाम की कोई चीज़ नहीं’। उन्होंने कहा कि ‘हिंदू ’ एक फ़ारसी शब्द है, जिसे ब्राह्मणों ने समाज को “ग़ुलाम बनाने” के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने न सिर्फ़ हिंदू पहचान को नीचा दिखाया बल्कि हिंदू समाज की नींव पर तीखे कमेंट करते हुए कहा कि ब्राह्मणों ने लोगों को आपस में बाँटकर ही धर्म की परिभाषा तैयार की। उनके इन बयानों को वहां मौजूद लोगों ने आश्चर्य से सुना, और वीडियो सोशल मीडिया पर आने के बाद पूरे देश में विरोध शुरू हो गया।
आरएसएस पर गंभीर आरोप
पूर्व जज यहीं नहीं रुके। उन्होंने दावा किया कि देश में जितने भी छोटे-बड़े दंगे हुए हैं, उन सबके पीछे आरएसएस का हाथ है—यहाँ तक कि 1984 के सिख दंगे भी। उन्होंने कहा कि “देश का आम आदमी आरएसएस से डरता है, इसलिए खुलकर बोलता नहीं।” उनका यह बयान किसी सबूत या दस्तावेज़ के बिना था, परन्तु जिस मंच से यह बातें कही गईं, वह इसे और भी विवादित बना गया। कर्नाटक के इस कार्यक्रम में उनका तेवर इतना आक्रामक था कि कई लोग इसे सुनकर ही बाहर निकल गए।
हिंदुत्व, मुसलमानों को भड़काना, एल्गार परिषद और ISI तक के आरोप
यह कोई पहला मौका नहीं है जब कोलसे पाटिल विवादों में घिरे हों। पिछले कई वर्षों से उनका पूरा सक्रिय अभियान इसी तरह के भड़काऊ बयानों और आरोपों पर टिका रहा है। 2016 में उन्होंने दावा किया था कि “हिंदुत्व कोई वास्तविक विचार नहीं, बल्कि ब्राह्मणवाद का एक मुखौटा है।” कई सार्वजनिक मंचों पर उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि आरएसएस पाकिस्तान की ISI से धन लेता है—हालाँकि यह आरोप पूरी तरह आधारहीन और बिना किसी सबूत के था। उनका नाम 2017 की एल्गार परिषद से भी जुड़ा रहा, जिसके बाद भीमा–कोरेगांव में हिंसा भड़की थी। जांच एजेंसियों ने इस कार्यक्रम को ‘अर्बन नक्सल नेटवर्क’ का मंच बताया था, और कोलसे पाटिल को इसके प्रमुख आयोजकों और वैचारिक चेहरों में से एक माना गया।
एंटी-CAA प्रदर्शनों में भड़काऊ भाषण का वीडियो सामने आया
कोलसे पाटिल की विवादित छवि और गहरी तब हुई जब 2020 के एंटी-CAA प्रदर्शनों के दौरान उनका एक वीडियो सामने आया, जो जमात-ए-इस्लामी हिंद के एक कार्यक्रम का था। वीडियो में वे मुस्लिम भीड़ को खुले तौर पर उकसाते हुए कहते दिखे— “या तो सड़क पर उतरकर लड़ते हुए मर जाओ, या चुपचाप सड़ते हुए मर जाओ।” CAA को लेकर गलत जानकारी फैलाते हुए उन्होंने दावा किया कि यह कानून सिर्फ हिंदुओं को बचाने के लिए बनाया गया है और मुसलमानों को “डिटेंशन सेंटर्स” में डाला जाएगा—जबकि यह दावा पूरी तरह झूठा था। उनकी यह स्पीच ऐसे समय आई थी जब देश CAA के नाम पर हो रही हिंसा से जूझ रहा था, जिस वजह से आलोचकों का कहना था कि वे तनाव कम करने के बजाय माहौल को और उकसा रहे थे।
सावरकर पर झूठ फैलाने का मामला और पत्रकार का आरोप
पूर्व जज पर गंभीर आरोपों की सूची यहीं खत्म नहीं होती। इस साल जनवरी में पुणे पुलिस ने उन पर वीर सावरकर के बारे में झूठ फैलाने का केस दर्ज किया। उन्होंने दावा किया था कि सावरकर पर लंदन में रेप का केस चला था और वे आजादी के खिलाफ थे—जबकि दोनों ही बातें इतिहास के मुताबिक पूरी तरह गलत पाई गईं। इसके अलावा, एक महिला पत्रकार ने भी कोलसे पाटिल पर अभद्र टिप्पणी और यौन उत्पीड़न जैसे व्यवहार का आरोप लगाया। पत्रकार के मुताबिक, इंटरव्यू के दौरान पाटिल ने उसके कपड़ों पर टिप्पणी की और “दोस्ती” करने का प्रस्ताव रखा, जो बेहद आपत्तिजनक माना गया।
बिदर में फिर दोहराए वही आरोप
बिदर में दिए गए उनके ताज़ा भाषण ने इन पुराने विवादों को फिर जगा दिया। यहाँ उन्होंने एक बार फिर ब्राह्मण समुदाय को “डरपोक” कहा, हिंदू पहचान को “झूठ” बताया और धार्मिक नेताओं से कहा कि वे मंचों पर हिंदू पहचान का “खुलकर विरोध” करें। कर्नाटक में मुस्लिम समुदाय की मौजूदगी में दिए गए इस भाषण के बाद कई लोगों ने उनकी नीयत और उद्देश्य पर सवाल उठाए हैं। कुल मिलाकर, कोलसे पाटिल के बयान अब केवल विवाद तक सीमित नहीं रहे। आलोचकों का कहना है कि उनके भाषण समाज में तनाव बढ़ाने वाले, एक ही समुदाय को लगातार निशाना बनाने वाले और धार्मिक कट्टरपंथी समूहों को ताकत देने वाले होते जा रहे हैं। उनकी आलोचना करने वालों का कहना है कि यह “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है जो भारत की सामाजिक एकता और संवैधानिक मूल्यों पर सीधा हमला करती है।
