लखनऊ: उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायत की राजनीति में चल रहे विवाद ने एक बड़ा मोड़ ले लिया है। फर्जी SC-ST एक्ट का सहारा लेकर विपक्षियों को फँसाने वाली महिला गुड्डी को विशेष SC-ST कोर्ट ने दोषी ठहराया और डेढ़ साल की कैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने इस पूरे मामले में कई अहम टिप्पणियाँ भी कीं, जो सीधे पंचायत व्यवस्था और जातीय राजनीति पर सवाल खड़े करती हैं।
कोर्ट का बड़ा आदेश: राहत राशि रोकने का निर्देश
विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने अपने आदेश में कहा कि विधायिका का मकसद कभी यह नहीं था कि करदाताओं के पैसों को झूठी रिपोर्ट दर्ज कराने वालों पर खर्च किया जाए। कोर्ट ने जिलाधिकारी और पुलिस कमिश्नर को आदेश की प्रति भेजने के साथ निर्देश दिया कि चार्जशीट दाखिल होने से पहले किसी भी स्थिति में राहत राशि न दी जाए। केवल एफआईआर दर्ज होते ही राहत राशि देने की प्रवृत्ति को कोर्ट ने खतरनाक बताया और कहा कि इससे फर्जी केस दर्ज कराने की संख्या बढ़ रही है। यदि गुड्डी को पहले से कोई राहत राशि दी गई है, तो उसे तत्काल वापस लिया जाए।
पंचायत चुनावी रंजिश बनी झूठे केस की वजह
यह पूरा विवाद ग्राम पंचायत की विकास निधि और चुनावी रंजिश से जुड़ा था। मामले में सामने आया कि ग्राम प्रधान पद पर मथुरा प्रसाद की पत्नी जीत गई थीं। इससे नाराज़ होकर विपक्षी खेमे के राजू रावत ने अपनी भाभी गुड्डी को आगे करके विरोधियों के खिलाफ फर्जी रिपोर्ट दर्ज कराई। कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पंचायत चुनावों में जातीय खेमेबाजी और वोट बटोरने के लिए पैसे और शराब का खुला खेल होता है। यही वजह है कि चुनाव बाद फर्जी मुकदमे, मारपीट और यहां तक कि हत्याओं तक की घटनाएं सामने आती हैं।
माल थाने में दर्ज हुई थी FIR
पत्रावली के अनुसार, गुड्डी ने 6 नवंबर 2024 को माल थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उसने कहा था कि जब वह दवा लेकर घर लौट रही थी, तभी मतगुड़ा, विनोद अवस्थी और अनूप अवस्थी ने उसे गाली दी, मारपीट की और धमकाया। लेकिन विवेचना में मामला पलट गया— एसीपी बीकेटी की जांच में साबित हुआ कि अनूप अवस्थी उस समय फैजुल्लागंज में मौजूद थे। वहीं बाकी दोनों आरोपी मथुरा प्रसाद के घर पर थे। इन साक्ष्यों के आधार पर विवेचक ने गुड्डी की शिकायत को झूठा पाया और उसके खिलाफ फर्जी मुकदमा लिखाने का परिवाद कोर्ट में दाखिल कर दिया। जांच से यह भी सामने आया कि ग्राम प्रधान ने गुड्डी के पक्ष के खिलाफ पहले ही रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उसी दबाव को तोड़ने और विरोधियों को फँसाने के लिए गुड्डी ने यह झूठा केस दर्ज कराया। अंततः अदालत ने इसे गंभीर अपराध मानते हुए उसे डेढ़ साल की कैद की सजा सुना दी।
