बरेली: उत्तर प्रदेश के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने सरकार की कुछ नीतियों, खासकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए नियमों से गहरी असहमति जताई है। अधिकारियों के अनुसार, अग्निहोत्री ने अपना इस्तीफा ई-मेल के माध्यम से राज्यपाल और बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह को भेजा। अलंकार अग्निहोत्री 2019 बैच के उत्तर प्रदेश प्रांतीय सिविल सेवा (PCS) अधिकारी हैं। वे मूल रूप से कानपुर नगर के रहने वाले हैं और इससे पहले उन्नाव, बलरामपुर और लखनऊ में उप-जिलाधिकारी (SDM) के रूप में कार्य कर चुके हैं। प्रशासनिक हलकों में उन्हें एक सख्त और स्पष्टवादी अधिकारी के रूप में जाना जाता रहा है। अपने इस्तीफा पत्र में अग्निहोत्री ने लिखा कि जब सरकारें ऐसी नीतियां अपनाती हैं जो “समाज और राष्ट्र को बांटने का काम करती हैं”, तब उन्हें “जगाना” जरूरी हो जाता है। उन्होंने UGC के नए नियमों को “काला कानून” बताते हुए कहा कि ये कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक माहौल को खराब कर रहे हैं और इन्हें तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।
UGC के नए नियम क्या हैं
जिन नियमों को लेकर विवाद चल रहा है, उनका आधिकारिक नाम UGC Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 है, जिन्हें 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था। इन नियमों के तहत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इक्विटी (समता) समितियों के गठन, हेल्पलाइन की स्थापना और निगरानी तंत्र विकसित करने का प्रावधान किया गया है, ताकि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का प्रभावी समाधान किया जा सके। UGC के अनुसार, इन नियमों का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में कैंपस को अधिक सुरक्षित, समानता-आधारित और समावेशी बनाना है।
विरोध और बहस
हालांकि, इन नियमों का जनरल कैटेगरी के कुछ छात्रों और शिक्षाविदों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है। उनका कहना है कि यह ढांचा रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन (उल्टा भेदभाव) को बढ़ावा दे सकता है, शिकायत आधारित प्रणाली से शिक्षण संस्थानों में टकरावपूर्ण और अविश्वास का माहौल बन सकता है, और बिना स्पष्ट साक्ष्य व प्रक्रिया मानकों के कॉलेजों व विश्वविद्यालयों पर अनावश्यक प्रशासनिक बोझ डाला जा रहा है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों के बीच भी नियमों की संवैधानिक वैधता पर तीखी बहस चल रही है, जिसके चलते उच्च शिक्षा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विवाद का केंद्र बन गई है।
Bareilly, Uttar Pradesh: City Magistrate, Alankar Agnihotri says, "You may have seen the incidents I mentioned in my statement. One concerns what happened during the fair when our Shankaracharya went for bathing at Mauni Amavasya. Their disciples’ hair was pulled, and they were… pic.twitter.com/bTFarLjX7L
— IANS (@ians_india) January 26, 2026
गणतंत्र दिवस पर बयान और ब्राह्मणों पर टिप्पणी
गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने के बाद जब अग्निहोत्री ने मीडिया से बात की, तो उन्होंने अपनी आलोचना और तेज कर दी। उन्होंने आरोप लगाया कि UGC के ये नियम “ब्राह्मणों पर अत्याचार” का रास्ता खोल सकते हैं और इससे “सामाजिक अशांति” व “आंतरिक असंतोष” बढ़ सकता है। उन्होंने प्रयागराज में हुए एक हालिया धार्मिक विवाद का भी जिक्र करते हुए प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए।
प्रयागराज का शंकराचार्य विवाद
अग्निहोत्री जिस विवाद की बात कर रहे थे, वह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा है। वे फिलहाल प्रयागराज के माघ मेला क्षेत्र में अपने शिविर में डटे हुए हैं और मौनी अमावस्या के दिन त्रिवेणी संगम में स्नान से रोके जाने के विरोध में धरने पर बैठे हैं। मेला प्रशासन ने स्वामी को कई नोटिस जारी किए हैं, जिनमें एक नोटिस उनके ‘शंकराचार्य’ शीर्षक के उपयोग को लेकर भी है। यह मामला परंपरा और कानूनी विवादों से जुड़ा हुआ है। लंबे समय से चल रहे विरोध के कारण उनके शिविर के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई है, तनाव की खबरें सामने आई हैं और उनके स्वास्थ्य को लेकर भी चिंताएं जताई जा रही हैं। समर्थकों का कहना है कि यह मामला धार्मिक परंपराओं में प्रशासनिक हस्तक्षेप का उदाहरण है, जबकि आलोचकों का मानना है कि प्रशासनिक नियमों का पालन जरूरी है। इस तरह यह विवाद धार्मिक अधिकार, राज्य की शक्ति और सांस्कृतिक विरासत पर एक व्यापक बहस बन गया है।
“अब सिस्टम का हिस्सा नहीं बन सकता”
अलंकार अग्निहोत्री ने कहा कि लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है और ऐसे माहौल में वे अब सिस्टम का हिस्सा नहीं रह सकते। वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के पूर्व छात्र हैं और उनके पास B.Tech और LLB की डिग्री है। इसके अलावा वे अमेरिका में भी काम कर चुके हैं। अधिकारियों का कहना है कि गणतंत्र दिवस के दिन दिया गया इस्तीफा सरकार की नीतियों और शासन की दिशा को लेकर चल रही बहस को और तेज कर गया है।
