सेनारी नरसंहार की सच्चाई: 26 साल बाद भी ‘विधवाओं का गाँव’ आज वहीं खड़ा है, जहाँ 1999 में लहू से लाल हुआ था बिहार

सेनारी गाँव, अरवल ज़िला (पूर्व में जहानाबाद): बिहार 18 मार्च 1999, यह वही तारीख है जब बिहार के इतिहास में एक दर्दनाक घटना दर्ज हुई थी। उस रात सेनारी गाँव की गलियों में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) के नक्सलियों ने 34 भूमिहार किसानों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इन लोगों को घरों से घसीटकर बाहर लाया गया और “लाल सलाम” के नारे लगाते हुए कतार में खड़ा कर मौत के घाट उतारा गया। यह घटना उस समय रणवीर सेना और MCC के बीच चल रहे संघर्ष की सबसे भयावह कड़ी थी। बिहार के मध्य हिस्से में जातीय और वर्गीय हिंसा की आग पहले से ही भड़क रही थी, लेकिन सेनारी ने उस आग को और भयानक रूप दे दिया। इस नरसंहार के बाद पूरे राज्य में सनसनी फैल गई। संसद से लेकर मीडिया तक में इस घटना की गूंज सुनाई दी।

सेनारी पहुँचा, जहाँ आज भी खामोशी बोलती है

पटना से करीब 80 किलोमीटर दूर अरवल ज़िले का सेनारी गाँव। गाँव के पास पहुँचते ही सड़कें खत्म हो जाती हैं और रास्ते गड्ढों में बदल जाते हैं। गाँव से लगभग पाँच किलोमीटर पहले पक्की सड़क गायब हो जाती है। यही वह गाँव है, जिसे लोग आज भी “विधवाओं का गाँव” कहते हैं, क्योंकि 1999 की उस रात के बाद यहाँ के कई घरों में सिर्फ औरतें बचीं थीं। गाँव के बीचोंबीच एक छोटा सा स्मारक है। उस पर उन 34 किसानों के नाम खुदे हैं, जिन्हें नक्सलियों ने मार दिया था। यह स्मारक आज भी उस रात की कहानी बयां करता है। उसके ठीक पास एक पुराना मंदिर है। मंदिर के पुजारी वही हैं जो उस रात गाँव में मौजूद थे। उन्होंने बताया — “मैं उस रात पेड़ पर चढ़ गया था और ऊपर से सब देख रहा था। नीचे चीखें सुनाई दे रही थीं। मेरा बेटा भी उन 34 में था, जिसे वो लोग खींचकर ले गए। मैं कुछ नहीं कर सका…” उनकी आँखें भर आती हैं, और शब्द बीच में ही टूट जाते हैं।

बचे हुए लोगों की गवाही, जो आज भी दर्द में जिंदा है

अजय शर्मा सेनारी नरसंहार के कुछ जीवित बचे लोगों में से एक हैं। उनके गले और पेट पर कुल्हाड़ी के गहरे निशान आज भी दिखाई देते हैं। वे बताते हैं — “हम लोगों को पकड़ लिया गया था। वो लोग ‘लालू जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे। मेरे भाई को मेरे सामने काट दिया गया। मैं डेढ़ महीना अस्पताल में भर्ती रहा। आज भी दवा चलती है…” अजय शर्मा की आवाज़ में अब भी डर झलकता है। उनका कहना है कि उस रात गाँव में कोई मदद नहीं पहुँची। पूरा इलाका अंधेरे में डूबा हुआ था और गोलियों की आवाज़ें गूँज रही थीं।

26 साल बाद भी सेनारी वहीं खड़ा है

1999 की घटना को 26 साल बीत चुके हैं, लेकिन सेनारी की स्थिति आज भी नहीं बदली है। गाँव तक आने वाली सड़क आधी टूटी हुई है। बरसात में कीचड़ और पानी भर जाता है। गाँव में 10वीं तक की पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं है, बच्चे 10 किलोमीटर दूर जाकर पढ़ते हैं। कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है, और इलाज के लिए लोगों को कस्बों या ज़िला मुख्यालय तक जाना पड़ता है। ग्रामवासियों का कहना है — “जो 34 लोग मारे गए, उनके नाम पर राजनीति तो खूब हुई, लेकिन हमारे गाँव की हालत किसी ने नहीं देखी। हम आज भी उसी जगह खड़े हैं जहाँ 1999 में थे।” यहाँ के सांसद और विधायक दोनों राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से हैं, लेकिन गाँव वालों के मुताबिक विकास का नाम अब तक नहीं पहुँचा।

न्याय की लंबी राह

सेनारी नरसंहार के बाद कुल 74 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई थी। साल 2016 में जहानाबाद की अदालत ने 15 आरोपियों को दोषी ठहराया। इनमें से 10 को फांसी की सज़ा और 3 को आजीवन कारावास मिला।लेकिन 2021 में पटना हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी बताते हुए 14 आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले से पीड़ित परिवारों में निराशा फैल गई। कई परिवार आज भी न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। नरसंहार के पीड़ितों के परिजन कहते हैं कि उन्हें न तो न्याय मिला, न पर्याप्त मुआवज़ा। सरकारें आईं और गईं, लेकिन सेनारी के जख्म वैसे ही ताज़ा हैं।

सेनारी — एक गाँव जो अब भी 1999 में अटका है

सेनारी गाँव आज भी खामोश है। टूटे घर, सूने आँगन, और वीरान गलियाँ उस रात की याद दिलाती हैं। स्मारक पर लगे नाम मिटने लगे हैं, लेकिन दर्द नहीं मिटा। गाँव की औरतें आज भी उस रात के बाद अकेलेपन के साथ जी रही हैं। कई बच्चे बिना पिता के बड़े हुए और अब वही खेतों में काम कर रहे हैं। 26 साल बीत गए, लेकिन सेनारी की तस्वीर नहीं बदली। यह गाँव आज भी अपनी सड़कों, स्कूल और अस्पताल का इंतजार कर रहा है।

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