लखनऊ: उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि आखिर एकलपीठ के फैसले को चुनौती क्यों दी गई है और उसमें कौन-कौन सी खामियां बताई जा रही हैं। मामला इसलिए खास है क्योंकि कुछ कॉलेजों में आरक्षण की सीमा 79% तक पहुंच गई थी।
एकलपीठ ने क्यों रद्द किए थे शासनादेश?
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अम्बेडकर नगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू आरक्षण संबंधी शासनादेशों को रद्द कर दिया था। ये शासनादेश 2010 से 2015 के बीच जारी किए गए थे। एकलपीठ के मुताबिक, कॉलेजों में आरक्षित वर्ग की सीटें इतनी ज्यादा थीं कि सामान्य श्रेणी के छात्रों के साथ अन्याय हुआ। उदाहरण के तौर पर, हर कॉलेज में राज्य सरकार के कोटे की 85-85 सीटें थीं, लेकिन उनमें से केवल 7 सीटें ही अनारक्षित छात्रों के लिए छोड़ी गई थीं। इसका मतलब था कि 79% से ज्यादा सीटें आरक्षित वर्ग के लिए सुरक्षित कर दी गई थीं।
सरकार की दलील और सुप्रीम कोर्ट का हवाला
राज्य सरकार की ओर से महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा व ट्रेनिंग ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस (मंडल कमीशन मामला) में 50% आरक्षण की जो सीमा तय की थी, वह अंतिम सीमा नहीं है। हालात के हिसाब से इसे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन एकलपीठ ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण सीमा बढ़ाने के लिए उचित नियम और कानूनी प्रक्रिया अपनाना जरूरी है, न कि मनमाने तरीके से सीटों का बंटवारा करना।एकलपीठ ने आदेश दिया था कि इन मेडिकल कॉलेजों में उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम 2006 का सख्ती से पालन हो और सीटों का बंटवारा नए सिरे से किया जाए। अब खंडपीठ ने सरकार से स्पष्ट रूप से जवाब मांगा है कि एकलपीठ के आदेश में खामियां कहां हैं।
खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए मंगलवार को फिर से सुनवाई तय की है।
