मुआवजे के लिए SC-ST एक्ट और गैंगरेप में फंसाया; 4 साल बाद कोर्ट ने किया रिहा, कहा – जिंदगी बर्बाद

ग्रेटर नोएडा : उत्तर प्रदेश में झूठे आरोपों की मार झेलते हुए चार साल जेल और अदालतों के चक्कर लगाने के बाद आखिरकार दो निर्दोष युवकों को इंसाफ मिल गया। ग्रेटर नोएडा की विशेष पोक्सो न्यायालय (अपर सत्र न्यायाधीश-2) श्री विजय कुमार हिमांशु ने वर्ष 2021 में दर्ज गैंगरेप, पोक्सो और एससी-एसटी एक्ट के मामले में दोनों आरोपितों को साक्ष्य विश्वसनीय न होने के कारण दोषमुक्त (बरी) कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा और आरोपितों को संदेह का लाभ दिया गया।

क्या था पूरा मामला

यह मामला वर्ष 2021 में थाना कासना क्षेत्र का है। आरोप था कि एक नाबालिग बालिका का अपहरण कर दो युवकों ने उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस शिकायत पर पुलिस ने कुणाल उर्फ भूपेंद्र और भगत उर्फ कालू, दोनों निवासी ग्राम नियाना सलेमपुर, के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।पुलिस विवेचना के बाद दोनों आरोपितों के विरुद्ध गंभीर धाराओं में आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया गया। न्यायालय ने उनके खिलाफ धारा 328, 365, 376D, 504, 506 (भारतीय दंड संहिता), धारा 3(2)(v) (एससी/एसटी एक्ट) और धारा 5/6 (पोक्सो एक्ट, 2012) के तहत आरोप तय किए। इन धाराओं में दोष सिद्ध होने पर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। हालांकि, अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के विरोधाभासी बयानों के कारण अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ गया और आरोपों पर संदेह की स्थिति बन गई।

अदालत में क्या हुआ

अभियोजन पक्ष की ओर से छह गवाहों को अदालत में प्रस्तुत किया गया, जिनमें विवेचक, चिकित्सक और पुलिस अधिकारी शामिल थे। अभियोजन की ओर से पैरवी विशेष लोक अभियोजक चवनपाल भाटी ने की, जबकि बचाव पक्ष का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता रामशरण नागर (पूर्व अध्यक्ष, बार एसोसिएशन), देवदत्त सिंह और सीमा चौहान एडवोकेट ने किया। बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि मामला पूरी तरह रंजिश और मुआवजे के लालच में गढ़ा गया है। पीड़िता के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे और न ही चिकित्सकीय रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि हुई। इन विरोधाभासों के चलते अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध नहीं कर पाया।

न्यायालय का फैसला

दोनों पक्षों की बहस सुनने और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद न्यायाधीश विजय कुमार हिमांशु ने कहा कि “जब तक साक्ष्य ठोस और विश्वसनीय न हों, किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।” अदालत ने इस आधार पर दोनों अभियुक्तों कुणाल उर्फ भूपेंद्र और भगत उर्फ कालू को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। चार साल की इस कानूनी लड़ाई ने दोनों युवकों की जिंदगी बदल दी। परिवारों ने कहा कि “झूठे मुकदमे ने हमारी इज्जत और सालों की मेहनत दोनों छीन लीं, लेकिन अदालत ने आखिरकार सच्चाई साबित कर दी।”

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