लखनऊ : उत्तर प्रदेश के एक चर्चित फर्जी एससी-एसटी और रेप मामले में 15 साल बाद आखिरकार इंसाफ हुआ है। साल 2011 में दर्ज इस केस में विल्सन सिंह उर्फ आशु को गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा, लेकिन लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस फैसले के साथ ही अब शिकायत करने वाली युवती के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। यह मामला न सिर्फ एक व्यक्ति की बर्बाद होती जिंदगी की कहानी है, बल्कि फर्जी मामलों के दुरुपयोग की गंभीर तस्वीर भी पेश करता है।
कैसे दर्ज हुआ था एससी-एसटी एक्ट और रेप का मामला
यह मामला 9 अप्रैल 2011 को लखनऊ के विकास नगर थाने में दर्ज किया गया था। एक दलित युवती ने विल्सन सिंह उर्फ आशु पर आरोप लगाया कि उसने उसके साथ दुष्कर्म किया और जाति के नाम पर अपमान व प्रताड़ना की। युवती उस समय एसपी बाराबंकी कार्यालय में तैनात रहे हेड कांस्टेबल शरद श्रीवास्तव के घर काम करती थी। एफआईआर में घटना की तारीख 5 अप्रैल 2011 बताई गई और समय दोपहर करीब 2:30 बजे दर्ज किया गया। इन गंभीर आरोपों के बाद विल्सन सिंह की जिंदगी पूरी तरह बदल गई और उन्हें सालों तक पुलिस और अदालतों के चक्कर काटने पड़े।
जांच में सामने आई फर्जी कहानी की सच्चाई
जब पुलिस ने युवती का मेडिकल परीक्षण कराया, तो उसमें रेप की पुष्टि नहीं हुई। इसके बाद कोर्ट में चली लंबी सुनवाई के दौरान पूरा मामला धीरे-धीरे सामने आया। जांच में पता चला कि शरद श्रीवास्तव को विल्सन सिंह के 14 हजार रुपये देने थे। विल्सन सिंह उनके यहां कार चालक के रूप में काम करता था। अप्रैल 2011 में जब विल्सन की मां की तबीयत खराब हुई, तो वह अपनी बकाया रकम मांगने शरद श्रीवास्तव के पास गया। इसी बात पर दोनों के बीच विवाद हो गया। आरोप है कि इसी विवाद के बाद शरद श्रीवास्तव ने विल्सन को फर्जी केस में फंसाने की धमकी दी और बाद में उसी के तहत युवती से एससी-एसटी एक्ट और रेप का केस दर्ज करवा दिया गया।
कोर्ट का फैसला और 14 साल बाद मिला इंसाफ
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस और भरोसेमंद सबूतों से साबित नहीं कर सका। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता के बयानों में गंभीर विरोधाभास और असंगतियां थीं। न तो रेप का आरोप साबित हो पाया और न ही एससी-एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोप टिक सके। अंततः अपर सत्र न्यायाधीश हुसैन अहमद अंसारी, विशेष न्यायालय (एससी/एसटी) ने विल्सन सिंह उर्फ आशु को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने शिकायतकर्ता के खिलाफ धारा 344 सीआरपीसी के तहत कार्रवाई के निर्देश भी जारी किए। 14–15 साल तक चली इस कानूनी लड़ाई के बाद विल्सन सिंह को राहत तो मिली, लेकिन इस दौरान उन्होंने जो मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा झेली, वह इस फैसले के साथ भी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती।
