किराये के विवाद में दर्ज एससी-एसटी केस रद्द, हाई कोर्ट ने वकीलों की हड़ताल और गवाहों के बयान पर भी दिए अहम निर्देश

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किराये के विवाद से जुड़े एक मामले में दर्ज एससी-एसटी एक्ट के केस को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल आरोप लगाने से एससी-एसटी एक्ट लागू नहीं हो जाता, बल्कि इसके लिए ठोस साक्ष्य और जाति सूचक शब्दों के स्पष्ट प्रयोग का प्रमाण होना आवश्यक है। यह आदेश न्यायमूर्ति सुभाष चन्द्र शर्मा ने वाराणसी के कैंट थाना क्षेत्र निवासी विवेक शर्मा और काजल राय की याचिका पर पारित किया। दोनों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(5) के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया था।

किराये के बकाये को लेकर विवाद, जातिगत अपशब्द का आरोप नहीं हुआ साबित

याचियों की ओर से अधिवक्ता सत्येंद्र कुमार त्रिपाठी ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता राजेश कुमार उनका किरायेदार है और करीब 18 महीने से किराया बकाया है। इसी विवाद के कारण झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि याचियों ने मकान खाली कराने के लिए 50 हजार रुपये की मांग की और रुपये न देने पर काजल राय के साथ दुष्कर्म के झूठे केस में फंसाने की धमकी दी। हालांकि विवेचना के दौरान शिकायतकर्ता राजेश कुमार और उनकी भाभी चंपा देवी ने अपने बयानों में कहीं भी जाति सूचक शब्दों के प्रयोग की बात नहीं कही। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और बयानों से एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 389 के तहत केस की कार्यवाही जारी रहेगी और यदि याचीगण अपराध से बरी किए जाने की अर्जी दाखिल करते हैं, तो संबंधित अदालत साक्ष्यों और कानून के अनुसार आदेश पारित करेगी।

वकीलों की हड़ताल और गवाहों के बयान पर हाई कोर्ट की अहम टिप्पणियां

इसी फैसले के क्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वकीलों की हड़ताल को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकलपीठ ने कहा कि यदि वकील हड़ताल पर हों और अदालत में पेश न हों, तो उप निदेशक चकबंदी (डीडीसी) महाराजगंज वादकारियों की सुनवाई कर पत्रावली के आधार पर उचित आदेश पारित करें। कोर्ट ने कहा कि वकीलों की हड़ताल से वादकारियों के हित प्रभावित नहीं होने चाहिए। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के कैप्टन हरीश उप्पल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले का उल्लेख किया गया, जिसमें वकीलों की हड़ताल को अवैध ठहराया गया है। इसके अलावा हाई कोर्ट ने गवाहों के बयान को लेकर भी अहम टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति नलिन कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा कि यदि कोई गवाह बाद में अपने बयान से मुकर जाता है, तो भी उसका बयान पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता, यदि उसकी पुष्टि अन्य साक्ष्यों से हो रही हो। इसी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने विवाहिता की हत्या के मामले में दोषियों की अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। मामले के अनुसार, अलीगढ़ जिले के चौगानपुर, हरदुआगंज निवासी चोखेलाल ने 30 जुलाई 2019 को थाना रामघाट, बुलंदशहर में एफआईआर दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया कि उनकी बेटियों ममता और चंद्रावती की शादी तेजवीर और राकेश से हुई थी। बाद में चंद्रावती ने फोन कर सूचना दी कि ममता को जहर दे दिया गया है। गाजियाबाद स्थित फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की 8 अगस्त 2019 की रिपोर्ट में विसरा में आर्गेनो-क्लोरो कीटनाशक की मौजूदगी पाई गई। सत्र न्यायालय ने 25 अक्टूबर 2021 को पति तेजवीर, ससुर नानकराम और सास मुन्नी को आईपीसी की धारा 302 और 34 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने सही ठहराया।

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