सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना CM रेवंत रेड्डी के खिलाफ SC/ST एक्ट केस रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ दर्ज SC/ST एक्ट मामले को रद्द करने के तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया है। शीर्ष अदालत ने शिकायतकर्ता की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट का निष्कर्ष कानूनी रूप से उचित और तर्कसंगत था।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और बेंच का फैसला

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और विपुल पंचोली शामिल थे, ने शिकायतकर्ता एन. पेड्डी राजू की याचिका खारिज कर दी। याचिका में जुलाई 2025 में हाईकोर्ट द्वारा केस बंद किए जाने को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में राजनीतिक पृष्ठभूमि दिखाई देती है और हाईकोर्ट का फैसला परिस्थितियों के अनुसार पूरी तरह संभव और वैध था।

जमीन विवाद, आरोप और हाईकोर्ट का विस्तृत निष्कर्ष

मामला हैदराबाद के गोपनपल्ली गांव में जमीन विवाद से जुड़ा था। शिकायतकर्ता, जो अनुसूचित जाति (माला) समुदाय से संबंधित है और एक हाउसिंग सोसाइटी से जुड़ा था, ने आरोप लगाया था कि रेवंत रेड्डी ने अपने भाई और अन्य लोगों को जमीन पर कब्जा करने और दो कमरे गिराने के लिए उकसाया। आरोपों में यह भी कहा गया कि जातिसूचक टिप्पणियां की गईं। इसी आधार पर SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ। हाईकोर्ट ने कहा कि यह मूल रूप से सिविल प्रकृति का जमीन विवाद है। केवल शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति से होना SC/ST एक्ट लागू होने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपराध तभी बनता है जब जाति के आधार पर जानबूझकर अपमान, धमकी या उत्पीड़न किया गया हो। चार्जशीट में ऐसे ठोस साक्ष्य नहीं पाए गए, इसलिए अदालत ने इसे कानूनी और तथ्यात्मक आधार पर कमजोर मानते हुए केस रद्द कर दिया।

जज पर आरोप, अवमानना मामला और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

इस मामले से जुड़े एक अन्य घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिकाकर्ता और वकील के खिलाफ अवमानना कार्यवाही भी बंद कर दी, जिन्होंने हाईकोर्ट की जज मौसुमी भट्टाचार्य पर आपत्तिजनक आरोप लगाए थे। इससे पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की बेंच ने नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा था। बाद में माफी मांगे जाने पर अदालत ने उसे स्वीकार कर लिया। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने कहा कि जब अदालतें पक्ष में फैसला नहीं देतीं, तब जजों पर बेबुनियाद आरोप लगाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो न्याय व्यवस्था के लिए चिंताजनक है और इसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने माफी स्वीकार करते हुए अवमानना मामला भी समाप्त कर दिया और हाईकोर्ट के फैसले को अंतिम रूप से बरकरार रखा।

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