नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने से जुड़े सभी मामलों को वापस मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को भेज दिया है। कोर्ट ने उच्च न्यायालय से कहा है कि वह इस मामले की विस्तार से सुनवाई करे और कोशिश करे कि तीन महीने के भीतर फैसला सुनाए। यह विवाद पिछले करीब पांच साल से चल रहा है और इसका मुख्य मुद्दा कुल आरक्षण की 50% सीमा को पार करने का है।
1994 का कानून और आरक्षण की पुरानी व्यवस्था
यह विवाद वर्ष 1994 में बने मध्य प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम से जुड़ा है। यह कानून सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ के बाद बनाया गया था। 1994 के इस कानून के तहत सरकारी नौकरियों में आरक्षण इस प्रकार तय किया गया था कि अनुसूचित जाति को 16 %, अनुसूचित जनजाति को 20 % और अन्य पिछड़ा वर्ग को 14%आरक्षण दिया गया। राज्य के पुनर्गठन के बाद भी मध्य प्रदेश में यही आरक्षण व्यवस्था लागू रही।
27% OBC आरक्षण की मांग और 2019 का संशोधन
समय के साथ राज्य में OBC आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% करने की मांग तेज होती गई। लेकिन कुल आरक्षण की 50% की सीमा (जो सुप्रीम कोर्ट ने तय की है) के कारण यह फैसला लंबे समय तक टलता रहा। आखिरकार मार्च 2019 में मध्य प्रदेश के राज्यपाल ने एक अध्यादेश जारी कर OBC आरक्षण को 27% करने का प्रावधान किया। बाद में इसे कानून का रूप देते हुए मध्य प्रदेश लोक सेवा (आरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2019 पारित किया गया। यह कानून 24 दिसंबर 2019 को राज्य राजपत्र में प्रकाशित हुआ। इसके तुरंत बाद इस बढ़े हुए आरक्षण को कई याचिकाओं के जरिए हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट की रोक, नई भर्तियाँ और दोबारा विवाद
मार्च 2019 में ही हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए 27% OBC आरक्षण लागू करने पर रोक लगा दी। यह रोक संशोधन कानून बनने के बाद भी जारी रही। इसके बावजूद राज्य सरकार ने 2021 और 2022 में कई भर्ती विज्ञापन जारी किए, जिनमें 27% OBC आरक्षण का प्रावधान रखा गया। 2 सितंबर 2021 को सामान्य प्रशासन विभाग ने आदेश दिया कि जिन भर्तियों पर सीधा कोर्ट केस नहीं है, उनमें 27% आरक्षण लागू किया जाए। इससे फिर विवाद बढ़ा और मई 2022 में हाईकोर्ट ने दोबारा आदेश दिया कि संबंधित भर्तियों में OBC को 14% से ज्यादा आरक्षण न दिया जाए। इसी दौरान राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर याचिका दाखिल की। सरकार का तर्क था कि छत्तीसगढ़ में आरक्षण बढ़ाने से जुड़े मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, इसलिए इन मामलों को भी वहीं सुना जाए। अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के मामलों को अपने पास मंगा लिया। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी मांग की कि कर्मचारियों की भारी कमी को देखते हुए 27% OBC आरक्षण के साथ भर्तियाँ करने की अनुमति दी जाए। सरकार ने मई 2023 में छत्तीसगढ़ आरक्षण मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया, जिसमें अंतिम फैसले के अधीन रहते हुए नियुक्तियों और पदोन्नतियों की अनुमति दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: हाईकोर्ट ही करेगा अंतिम जांच
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि छत्तीसगढ़ का मामला अलग है और हर राज्य की सामाजिक स्थिति और आरक्षण नीति अलग होती है। इसलिए मध्य प्रदेश के मामले में वही आदेश सीधे लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब तक हाईकोर्ट के सभी आदेश अंतरिम (अस्थायी) हैं। ऐसे में बिना हाईकोर्ट के विस्तृत तथ्यात्मक और कानूनी विश्लेषण के सीधे सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतिम फैसला देना उचित नहीं होगा। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने सभी सिविल अपील, विशेष अनुमति याचिकाएँ (SLP), ट्रांसफर केस और रिट याचिकाएँ वापस मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को भेज दीं। साथ ही हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा गया है कि वह एक विशेष पीठ गठित करें और कोशिश करें कि तीन महीने के भीतर मामले का निपटारा करें। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने 27% OBC आरक्षण की वैधता पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अब यह तय करना कि 27% आरक्षण संविधान की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं, पूरी तरह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हाथ में है।
